नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। राजनैतिक धार्मिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद को सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से सुलझाने के लिए मध्यस्थता को भेजा था। कोर्ट ने दोनों समुदायों के सदस्यों को शामिल करते हुए सेवानिवृत न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल गठित किया था। इस पैनल की अगुवाई में पांच महीने तक कई दौर की मध्यस्थता कार्यवाही चली लेकिन विवाद का हल नहीं निकला।

मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का प्रयास
वैसे तो शुरुआत मे जब कोर्ट ने मामला मध्यस्थता के लिए भेजने का सुझाव दिया था तभी विभिन्न पक्षकारों ने कोर्ट में कहा था कि इससे कोई नतीजा नहीं निकलेगा क्योंकि कई बार विवाद को आपसी सहमति से समझौते के जरिए निपटाने के प्रयास हो चुके हैं और सफलता नहीं मिली। लेकिन कोर्ट ने मुख्य मुकदमें से जुड़े दस्तावेजों के अनुवाद होने तक प्रायोगिक तौर पर मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का प्रयास करने की पेशकश की थी।

श्रीश्री रविशंकर समेत ये थे सदस्य
कोर्ट ने पिछले 8 मार्च को मामला मध्यस्थता के लिए भेजते हुए तीन सदस्यों का मध्यस्थता पैनल गठित किया था जिसके अध्यक्ष सेवानिवृत न्यायाधीश एफएमई कलीफुल्ला थे जबकि आध्यात्मिक गुरू श्रीश्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू सदस्य थे। कोर्ट ने शुरू में मध्यस्थता के लिए आठ सप्ताह का समय दिया था जिसे बाद में पैनल के अनुरोध पर बढ़ा कर 15 अगस्त कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल
इस बीच मुकदमे के पक्षकार गोपाल सिंह विशारद ने 9 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की जिसमें कहा गया कि मध्यस्थता में कुछ ठोस प्रगति नहीं हुई है और इससे विवाद का हल निकलने की उम्मीद नहीं है। कोर्ट मध्यस्थता समाप्त कर अपीलों पर जल्दी सुनवाई शुरू करे। इस अर्जी पर कोर्ट ने 11 जुलाई को सुनवाई की और मध्यस्थता पैनल से 18 जुलाई को प्रगति रिपोर्ट मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मांगी रिपोर्ट
कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर रिपोर्ट देखकर उसे लगा कि मध्यस्थता समाप्त कर दी जानी चाहिए तो कोर्ट मध्यस्थता समाप्त कर देगा और मामले पर 25 जुलाई से रोजाना सुनवाई करेगा। लेकिन इस बीच 18 जुलाई को कोर्ट मध्यस्थता पैनल की रिपोर्ट देखेगा और उसके बाद आगे का फैसला लेगा। 18 जुलाई को पैनल की प्रगति रिपोर्ट देखने के बाद कोर्ट ने पैनल को 31 जुलाई तक का समय देते हुए 1 अगस्त को फिर रिपोर्ट मांगी थी।

रोजाना सुनवाई का निर्णय
पैनल ने 1 अगस्त को रिपोर्ट दाखिल की थी जिस पर कोर्ट ने शुक्रवार को विचार करने के बाद छह अगस्त से मुकदमे की रोजाना सुनवाई का निर्णय लिया। कोर्ट ने आदेश में दर्ज किया कि मध्यस्थता कार्यवाही में विवाद का हल नहीं निकला लेकिन कोर्ट ने यह नहीं सार्वजनिक किया कि मध्यस्थता पैनल ने अपनी रिपोर्ट मे क्या कहा है। 18 जुलाई की अंतरिम रिपोर्ट में भी पैनल ने क्या कहा था इसका भी कोर्ट ने खुलासा नहीं किया।

गोपनीयता बरतने के दिए गए थे आदेश
बात यह है कि कोर्ट ने मामला मध्यस्थता को सौंपते वक्त ही मध्यस्थता कार्यवाही में पूरी तरह गोपनीयता बरते जाने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने साफ कहा था कि कोई भी पक्षकार मध्यस्थता में हुई कार्यवाही को सार्वजनिक नहीं करेगा। इस बात को कोर्ट ने अपने 18 जुलाई के आदेश में फिर दर्ज किया जिसमें कहा कि 8 मार्च को मामला मध्यस्थता के लिए भेजते वक्त मध्यस्थता कार्यवाही में गोपनीयता बरतने के आदेश दिए गए थे इसलिए रिपोर्ट के तथ्य रिकार्ड पर दर्ज करना उचित नहीं लगता।

गोपाल सिंह विशारद की अर्जी पर तय समय से पहले खत्म हो मध्यस्थता
गोपाल सिंह विशारद अयोध्या विवाद में मुख्य याचिकाकर्ताओं में से हैं। इनके पिता राजेन्द्र सिंह ने 1950 में पहला मुकदमा दाखिल किया था जिसमें बिना रोक टोक रामलला की पूजा का हक मांगा गया था साथ ही जन्मस्थान पर रखी रामलला की मूर्तियों को वहां से हटाने पर स्थाई रोक मांगी थी।

फैजाबाद जिला अदालत से होता हुआ यह मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था जिसमें हाईकोर्ट ने अन्य याचिकाओं के साथ फैसला दिया था। विशारद ने अर्जी में कहा था कि करीब पांच महीने की मध्यस्थता में अभी तक कोई ठोस प्रस्ताव नहीं निकला है न ही उसे पक्षकारों के बीच कोई समझौता होने की उम्मीद लगती है।मध्यस्थता के दौरान जो सुझाव आये वे मध्यस्थता प्रक्रिया के दायरे में भी नहीं आते थे। वे राजनैतिक प्रकृति के थे।

इससे लगता है कि मध्यस्थता से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। मामले का एकमात्र हल कोर्ट से ही तय हो सकता है। ऐसे में कोर्ट मध्यस्थता समाप्त कर अपीलों की मेरिट पर शीघ्र सुनवाई करे। गोपाल सिंह विशारद जो पिता की मृत्यु के बाद उनकी जगह मुकदमें में कानूनी वारिस है, ने अर्जी में कहा था कि वह भी करीब 80 वर्ष के हो गए हैं और अभी तक पिता द्वारा दाखिल मुकदमें के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

निर्मोही अखाड़ा ने भी उठाया था सवाल
निर्मोही अखाड़ा ने भी मध्यस्थता कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए पिछली सुनवाइयों में कोर्ट में कहा था कि मध्यस्थता में मुख्य पक्षकारों के बीच सीधी बातचीत होनी चाहिए ताकि कोई हल निकले लेकिन कई बार अनुरोध के बावजूद मौजूदा प्रक्रिया में ऐसा नहीं हो रहा है। जबतक पक्षकारों के बीच सीधी बातचीत नहीं होगी तबतक मध्यस्थता सफल नहीं हो सकती। उससे भी पहले निर्मोही अखाड़ा ने एक अर्जी दाखिल की थी जिसमें कि मध्यस्थता पैनल मे दो और सेवानिवृत न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग की गई थी। हालांकि इस अर्जी पर कोई आदेश नहीं हुआ।

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Posted By: Dhyanendra Singh

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