जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। भारत और फ्रांस के रिश्तों की गहराई के साथ ही मौजूदा राफेल सौदे पर जारी विवाद पर फ्रांस के नई दिल्ली में राजदूत एलेक्जांद्र जिगलर ने दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन के साथ बेबाकी से अपना पक्ष रखा। पेश है इस साक्षात्कार के संपादित अंश:

प्रश्न - आपने जून, 2016 में बतौर राजदूत कार्यभार संभाला था। अपने कार्यकाल के दौरान आप भारत-फ्रांस रिश्ते को कैसे देखते हैं?

उत्तर - मैं इसे एक सामान्य रिश्ते से ज्यादा एक पार्टनरशिप के तौर पर देखता हूं। यह पार्टनरिशप दो अहम बुनियाद पर टिका हुआ है।

पहला है भरोसा। हमने हमेशा एक दूसरे को ऑल वेदर पार्टनर समझा है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम हमेशा से यह समझते रहे हैं कि हम न सिर्फ सही समय में एक दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं जो बेहद आसान भी है बल्कि चुनौतीपूर्ण व विपरीत हालात में भी एक दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं। असलियत में मुश्किल हालात मे ज्यादा हम एक दूसरे के साथ खड़े होने का भरोसा है।

दूसरा बुनियाद है वैल्यूज। इसमें कई चीजें आती हैं। मसलन, लोकतंत्र, दुनिया में एक न्याय संगत व्यवस्था, पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता आदि। असलियत में बोलूं तो जब आप दुनिया के मानचित्र को देखेंगे तो ऐसे बहुत ही कम दो देश मिलेंगे जो एक साथ समान विचारों को साझा करते हो जैसा कि भारत व फ्रांस करते हैं। जब मैंने अपना कार्यभार संभाला तो मैंने एक बात देखी कि हमारे द्विपक्षीय रिश्ते काफी हद तक रणनीतिक केंद्रित है।

द्विपक्षीय रिश्तों के आर्थिक पहलू को लेकर काफी कुछ किया जाना था। तो मेरा ध्येय है कि एक तरफ जहां रणनीतिक रिश्तों को मजबूत बनाया जाये लेकिन आर्थिक रिश्तों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए और दोनो देशों की अवाम, खास तौर पर युवा पीढ़ी के बीच समझ-बूझ को और बढ़ाया जाये।

 प्रश्न - फ्रांस पहला देश था जिसके साथ भारत ने रणनीतिक साझेदारी स्थापित की थी। क्या अभी तक की प्रगति को संतोषजनक माना जा सकता है?

उत्तर- हां, निश्चित तौर पर। हमने 20 वर्ष पहले रणनीतिक रिश्ते की स्थापना की थी। इस खास रिश्ते की 20वीं सालगिरह मनाने के लिए हमारे विदेश मंत्री भी 14-15 दिसंबर, 2018 को भारत आ रहे हैं। आपको याद ही होगा कि मार्च, 2018 में हमारे राष्ट्रपति मैक्रॉ भारत आए थे। लेकिन आपको यह भी याद रखना होगा कि हमारी साझेदारी की शुरुआत वर्ष 1947 में भारत की आजादी के साथ हो गई थी। बाद के दशकों में यह लगातार मजबूत होती गई।

हमारे बीच एक रणनीतिक सोच विकसित होने के पीछे एक वजह यह भी थी कि भारत और फ्रांस दोनो इस बात को मानते है कि हमारी आजादी व सामरिक स्वायत्तता को हर हालात में बनाये रखने की जरुरत है। तो इस सोच के साथ हमने रक्षा से लेकर अंतरिक्ष तक और आण्विक ऊर्जा से लेकर दूसरे क्षेत्रों तक पार्टनरशिप को मजबूत बनाया।

हम रणनीतिक रिश्ते को नई उंचाई पर पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इस वर्ष भारत व फ्रांस ने हिंद महासागर के लिए साझी रणनीति की घोषणा की है। इसी तरह की साझी रणनीति हमने अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग के लिए लागू की है। इसका महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि यूरोपीय संघ के बाहर भारत पहला देश है जिसके साथ फ्रांस ने अंतरिक्ष क्षेत्र में व्यापक सहयोग का फैसला किया है। आतंकवाद के खिलाफ हमारा सहयोग काफी मजबूती से स्थापित हो रहा है।

प्रश्न: राफेल युद्धक विमान के खरीद को लेकर भारत में काफी विवाद चल रहा है। इस पर आपके देश की क्या प्रक्रिया है और इस सौदे के आफसेट क्लाज पर आपकी सरकार का क्या कहना है?

उत्तर - मेरा मानना है कि राफेल सौदे को लेकर जारी विवाद बिना वजह के कुछ आधारहीन और तोड़-मरोड़ कर पेश किये गए तथ्यों पर आधारित है। इस मुद्दे को मैं सिर्फ तथ्यों के आधार पर रखना चाहूंगा। इन तथ्यों के बारे में मैं आपको संक्षेप में बताने की कोशिश करता हूं। सबसे पहले तो यह राफेल डील अचानक ही कहीं से प्रकट नहीं हुआ है।

फ्रांस और भारत के बीच यह कोई पहली बार किया गया समझौता नहीं है। यह कोई एकमात्र या शार्ट टर्म कांट्रैक्ट नहीं है। यह भारत व फ्रांस के बीच पिछले 70 वषरें के रणनीतिक रिश्तों को लगातार मजबूत बनाने की कोशिशों का परिणाम है। खास तौर पर एयरोनॉटिक्स में हमारे रिश्तों को आप देखेंगे तो पाएंगे कि यह काफी जबरदस्त रहा है। दासो जैसी कंपनी भारतीय वायु सेना को पिछले छह दशकों से विमान की आपूर्ति कर रही है। हम भारत को मिराज श्रेणी के अत्याधुनिक युद्धक विमान भी दे चुके हैं।

दासो की पार्टनर कंपनी साफा व कुछ अन्य कंपनी भी भारत में इतने ही वषरें से काम कर रही हैं। इससे पता चलता है कि हमारे रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के बीच पुराना एतिहासिक संबंध रहे हैं। मेरा मानना है कि हमें राफेल सौदे को हमारी मजबूत और पुरानी रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में देखना चाहिए। इसके बाद आप देखिए कि राफेल का चयन एक लंबे समय तक चली प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के तहत किया गया है। इसका चयन इसलिए किया गया है कि यह दुनिया का सर्वोत्तम युद्धक विमान है।

दुनिया की पांच अन्य बड़ी कंपनियों के साथ मुकाबले के बाद इसका चयन हुआ था। यानी इसने लंबी दौड़ में जीत हासिल की थी। भारतीय वायु सेना की तत्काल परिचालन आवश्यकता को देखते हुए हमने 2015 में, एक अंतर-सरकारी समझौते का चयन करने का फैसला किया था। यह गारंटी देता है कि लड़ाकू विमानों की आपूर्ति तेजी से और बेहतर शतरें पर की जा सके।

भारत को आपूर्ति होने वाला पहला राफेल युद्धक विमान उड़ान भर चुका है। उसकी ट्रेनिंग चल रही है। पहला विमान 2019 में भारत पहुंच जाएगा। उसके बाद के दो वषरें के भीतर भारत की जरुरत के हिसाब से तैयार किये गये सभी 36 राफेल फाइटर प्लेन भारत पहुंच जाएंगे।

अब आफसेट क्लॉज के बारे में बात करते हैं। भारत और फ्रांस के बीच जो समझौता हुआ है उसके मुताबिक सौदे का 50 फीसद हिस्सा भारत में वापस आएगा। यानी जो कीमत भारत अदा करेगा उसका आधा हिस्सा फिर से भारत में आ जाएगा।

दूसरे शब्दों में कहें तो 30 हजार करोड़ रुपया भारत में निवेश के तौर पर, रोजगार सृजन के तौर पर, तकनीकी हस्तांतरण के तौर पर वापस आएगा। इस सौदे में न केवल एक बल्कि सौ भारतीय औद्योगिक भागीदार शामिल होंगे, जिसमें बड़ी और छोटी, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियां होंगी।और ज़ाहिर है, इन भागीदारों का चयन दासो पर है। इनकी चयन में हमारी सरकारों की कोई भूमिका नहीं थी।

हमारा मानना है कि 50 फीसद कीमत की ओफसेट्स के तहत लाना ही अपने आप में बेहद अनोखा है। यह एक तरह से फ्रांस की कंपनियों का भारत के प्रति दिखाई जाने वाली वचनबद्धता है जो यहां लंबी अवधि के निवेश करना चाहता है और लंबी साझेदारी स्थापित करना चाहते हैं।

प्रश्न - राष्ट्रपति मैक्रॉ की पिछली यात्रा के दौरान दोनो देशों ने हिंद व प्रशांत महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की बात कही थी..इसका क्या मतलब है?

उत्तर - हिंद महासागर का मुद्दा भारत व फ्रांस के रिश्ते में बेहद अहम है। इंडो-पैसिफिक का क्षेत्र दोनो देशों के लिए अहम है। इस क्षेत्र में फ्रांस के बीस लाख से ज्यादा नागरिक रहते हैं। यहां हमारे भौगोलिक क्षेत्र है। सैन्य सुविधाएं हैं। मिलिट्री बेस है। और इस क्षेत्र में हम एक जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अपने जहाजों को स्वतंत्रता से इस क्षेत्र में संचालित करने, पायरेसी, आतंकवाद जैसी चुनौतियां हैं। इसकी वजह से हमारे बीच और ज्यादा सहयोग स्थापित होने चाहिए

आपको मालूम होगा कि भारत और फ्रांस ने साथ मिल कर हिंद महासागर क्षेत्र के लिए एक साझा दृष्टिपत्र जारी किया है। यह हमारे बीच होने वाले सहयोग को साफ तौर पर बताता है। हमने रक्षा क्षेत्र में सहयोग का एक एजेंडा तैयार किया है जिसे हम लागू करने की प्रक्रिया में है। हमारी नौ सेनाओं के बीच सहयोग और प्रगाढ़ होगा।

मई, 2019 में हमारा एक एयरक्राफ्ट कैरियर यहां आएगा और भारतीय नौ सेना के साथ सालाना अभ्यास में हिस्सा लेगा। ब्लू इकोनोमी को लेकर हमारे बीच कुछ ठोस प्रस्तावों पर बात हो रही है। इसके अलावा यह क्षेत्र पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है जहां भारत व फ्रांस के बीच काफी सहयोग स्थापित करने की संभावना है और इस बारे में बात हो रही है। कहने का मतलब यह है कि इस समुद्री क्षेत्र में रक्षा से लेकर रणनीति और आर्थिक से लेकर पर्यावरण जैसे तमाम मुद्दे हैं जहां दोनों देशों के लिए अपार संभावनाएं हैं।

Posted By: Bhupendra Singh

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