नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। आज केंद्र सरकार में शामिल महेंद्रनाथ पांडेय के शुरुआती दिनों की बात है। गांव के जूनियर स्कूल में जिले में टॉप किया तो जितनी खुशी हुई, जल्दी ही उससे कहीं अधिक दुख हुआ। दरअसल, उस जमाने में रैंकिंग की लिस्ट पहले आती थी और बाद में पूरी रिजल्ट शीट। टॉपर होने के कारण वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाखिले की गारंटी से महेंद्रनाथ फूले नहीं समा रहे थे। लेकिन कुछ गलती से उनकी रिजल्टशीट में आते-आते इतनी देर हो गई कि कॉलेज में दाखिला प्रक्रिया खत्म हो गई। और फिर उन्हें एंग्लो बंगाली कॉलेज में दाखिला लेना पड़ा। वहां कॉलेज में फीस बढ़ी तो छात्रों में आक्रोश पैदा हुआ। बस फिर क्या था, अगली सुबह की प्रार्थना सभा में इस विषय पर महेंद्रनाथ पांडेय ने बात उठा दी। सभी छात्र उनके साथ खड़े हो गए। कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा और फीस घटानी पड़ी। इसके बाद कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष चुन लिए गए। छात्र जीवन में वाराणसी की अस्सी वाली शाखा के स्वयं सेवक रहे।

बीएचयू में स्थायी वाइस चांसलर बनाने की मांग को लेकर आंदोलनरत छात्र नेताओं का दल दिल्ली आया और यहां तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार में शिक्षा मंत्री रहे प्रतापचंद चंदर के 6, कृष्ण मेनन रोड स्थित आवास के सामने अनशन शुरू कर दिया गया। अनशन के चौथे दिन रात में धुंआधार बारिश होने लगी। टेंट उखड़ गए। गद्दे भीग गए। कड़ाके की ठंड के दिन थे। लाइट चली गई थी। अंधियारी रात में मंत्री का गेट खुला और अंदर से चंदर साहब छाता लगाए टार्च लेकर बाहर आए। उन्होंने अनशन खत्म करने को कहा। लेकिन छात्र टस से मस नहीं हुए। फिर उन्होंने कहा कि इतनी ही जिद है तो फिर मेरे बरामदे में आकर अनशन करो। लेकिन छात्र नहीं माने तो मंत्री जी दुखी होकर वापस लौट गए। लेकिन सुबह अपने मंत्रलय पहुंचते ही उन्होंने नये वाइस चांसलर की नियुक्ति प्रक्रिया शुरु कर दी। समय का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि महेंद्रनाथ पांडेय जब केंद्र में पहली बार मंत्री बने तो यही मंत्रलय मिला।

जब बीएचयू में क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी  
खैर, संघर्ष के दौर में घर वालों की ओर से रोजी-रोटी कमाने का दबाव था तो बीएचयू में क्लर्क की नौकरी का फार्म भरा। लेकिन बात नहीं बनीं। भाग्य को तो कुछ और ही मंजूर था। उसी साल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्रसंघ के महामंत्री चुन लिए गए। लेकिन पिताजी की नजर में फिर भी बेकार थे। खुद को पिताजी के सामने साबित करना था सो नौकरी की तलाश जारी थी। तभी भुड़कुड़ा डिग्री कॉलेज में हिंदी प्रवक्ता पद के लिए साक्षात्कार देने गए। लेकिन वहां के छात्रों को जब पता चला कि महेंद्रनाथ पांडेय पहुंचे हैं तो भीड़ लग गई। छात्र मिलने के लिए इकट्ठे हो गए।

जब पिता की नजरों में खुद को किया साबित 

उस समय वह गाजीपुर जिले की जखनिया, सैदपुर व सादात विधानसभा के भाजपा के इंचार्ज थे। ऐसा मान सम्मान देख महेंद्रनाथ का दिल ऐसा बदला कि बिना साक्षात्कार दिए ही वापस लौट गए। पिता की नजर में वह अभी भी खुद को साबित करने में नाकाम रहे थे। लेकिन फिर स्थिति बदली। दरअसल, पिताजी जहां एलआइसी में काम करते थे, वहां के एक-एक उच्चाधिकारी ने पिताजी से आग्रह किया कि क्या वह अपने बेटे से मुलाकात करा देंगे। पिताजी आश्चर्य में थे कि आखिर इतने बड़े अफसर को उनके बेरोजगार बेटे से क्या काम पड़ गया। अफसर ने कहा कि वह खुद घर पर आकर मिलेंगे। दरअसल, उन्हें अपने परिवार के बच्चों का बीएचयू में दाखिला करवाना था और ऐसे में नेताजी से अच्छा कौन होता। उस दिन पिताजी की आखें भर आई थीं और उन्होंने कहा था- ‘महेंदर तू लायक हो गइला।‘

आपातकाल के दौरान बीएचयू में अपनाया अनोखा तरीका
आपातकाल के दौरान बीएचयू में पांडेय ने अनोखा गुरिल्ला तरीका अपनाया था। रोजाना आठ बजे शाम को कैंपस में अचानक किसी चौराहे पर सरकार विरोधी नारे लगाकर अपनी-अपनी राह पकड़ लेते थे। लेकिन जल्दी ही मुखबिरी हुई और गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल भेज दिये गये। अयोध्या के श्रीराम मंदिर आंदोलन में महेंद्रनाथ पांडेय के खिलाफ रासुका लगा दी गई। कुल 21 बार जेल यात्र की है।

डॉक्टर पांडेय को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से 1980 में भारतीय जनता पार्टी में शिफ्ट कर दिया गया। 1991 में गाजीपुर की सैदपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। सिर्फ 17 हजार रुपये खर्च कर चुनाव लड़ा था। चुनाव हारा और फिर 1996 में विधायक बने तो राज्य में मंत्री बनाये गए। गठबंधन सरकार में भी कल्याण सिंह के नेतृत्व में मंत्री बने। पार्टी संगठन में सक्रिय व कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय पांडेय की राजनीतिक ताकत भी यही है।

Posted By: Ayushi Tyagi

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