नईदुनिया, रायपुर। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से अलग होकर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने राजनीतिक अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। सत्ता के शीर्ष से बेदखल होने के करीब 15 वर्ष बाद जोगी फिर उस शिखर पर अपना घरौंदा बनाने का सपना देख रहे हैं। इसके लिए वह तिनकों की तरह बिखरे छोटे दलों की ताकत को एकजुट कर तीसरी बड़ी शक्ति बनने की कोशिश में हैं।
इसके लिए उन्होंने पहले बसपा को साधा और अब सीपीआइ को भी साथ ले आए हैं। जोगी की निगाहें अब गोगंपा और सपा पर है। हालांकि, गठबंधन में आए इन दलों का पूरे राज्य में एक जैसा प्रभाव नहीं है। किसी हिस्से में एक का जनाधार ठीक है तो दूसरे में किसी और का।

कुछ सीटों पर त्रिकोणीय हो सकता है मुकबला
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि इस गठबंधन को हल्के में लेना कांग्रेस और भाजपा को भारी पड़ सकता है। बीते तीन चुनाव में अलग-अलग लड़ने के बावजूद बसपा और सीपीआइ कुछ सीटों पर कांग्रेस और भाजपा को टक्कर देने में सफल रही है।

गठबंधन में शामिल दलों की स्थिति

बसपा जीती, लेकिन असर सीमित

भाजपा व कांग्रेस के बाद बसपा ही एकमात्र पार्टी है, जिसके विधायक हर बार सदन में रहते हैं। 2003 व 2008 में पार्टी के दो-दो और 2013 में एक विधायक चुना गया। बसपा लगभग सभी 90 सीटों पर प्रत्याशी खड़ा करती है, इसके बावजूद उसका असर सीमित है।

राज्य बनने के बाद नहीं जीत पाई सीपीआइ
राज्य बनने के बाद सीपीआइ यहां एक भी सीट नहीं जीती है। 2003 में पार्टी ने 18 प्रत्याशी उतारे थे। 16 की जमानत जब्त हो गई। 2008 में 21 लड़े, 18 की जमानत जब्त हो गई। 2013 में 13 मैदान में थे, 12 जमानत भी नहीं बचा पाए।

सपा के खाते में एक फीसद भी वोट नहीं
छत्तीसगढ़ में सपा का असर नहीं दिखता। 2003 में सपा ने 52 सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी को कुल 0.95 फीसद वोट मिले। 2008 में यह आंकड़ा घटकर 0.53 पर आ गया। बीते चुनाव में पार्टी को प्राप्त वोटों का फीसद 0.29 रहा।

गोगंपा का कुछ सीटों पर असर, लेकिन वोट बेहद कम
गोगंपा के अध्यक्ष हीरा सिंह के अलावा कोई भी प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पाता है। हालांकि कुछ सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी दूसरे-तीसरे नंबर पर रहते हैं। उन्हें पांच हजार से भी कम वोट मिलता है।

Posted By: Prateek Kumar

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