जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग के गरीबों को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश में आरक्षण का प्रावधान करने वाले विधेयक को संसद से पास हुए अभी 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती दे दी गई। कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के विधेयक को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। यह याचिका गैर सरकारी संस्था यूथ फार इक्वेलिटी की ओर से दाखिल की गई है।

संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा ने दो तिहाई बहुमत से विधेयक पारित कर गरीबों को दस फीसद आरक्षण देने का संविधान में प्रावधान किये जाने पर मुहर लगाई थी। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये कानून की शक्ल ले लेगा। जैसी की आशंका जताई जा रही थी, विधेयक पारित होने के 24 घंटे के भीतर इसे सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दे दी गई।गुरुवार को कोर्ट में दाखिल हुई जनहित याचिका में संसद से पारित विधेयक को संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताते हुए रद करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में उपबंध 15(6) और 16(6) जोड़ने का प्रावधान किया गया है जिसके जरिये आर्थिक आधार पर 10 फीसद आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।

इससे संविधान के मूल ढांचे को बदलने और सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों का आधार बदले बगैर निष्प्रभावी करने की कोशिश की गई है। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन्द्रा साहनी फैसले में नौ जजों ने कहा है कि आरक्षण का एक मात्र आधार आर्थिक नहीं हो सकता।यह भी कहा गया है कि आर्थिक आरक्षण सिर्फ सामान्य वर्ग तक सीमित नहीं रखा जा सकता। याचिका में आर्थिक आरक्षण को चुनौती देने का तीसरा बिंदु आरक्षण की 50 फीसद की तय सीमा है।

कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अपने फैसले में कह चुकी है कि आरक्षण की कुल सीमा 50 फीसद से ज्यादा नहीं हो सकती। इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कि गैर सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू करना भी मनमाना है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में कह चुका है कि आरक्षण नीति को गैर सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में नहीं लागू किया जा सकता क्योकि ये संस्थान सरकार से मदद नहीं लेते हैं। ऐसे में यह विधेयक उन्हें रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकार का हनन करता है। 
 

Posted By: Tilak Raj

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