मॉडिफाइड गवर्नेंस के 12 वर्षों ने प्रशासन को दी नई दिशा: प्रेम शंकर झा
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों को इसी प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो एक ऐसी शासन-प्रक्रिया सामने आती ...और पढ़ें
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मॉडिफाइड गवर्नेंस के 12 वर्षों ने प्रशासन को दी नई दिशा। (रॉयटर्स)
HighLights
वित्तीय समावेशन और डिजिटल सेवाओं से प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ी।
बुनियादी ढाँचे का विकास और कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार हुआ।
'मॉडिफाइड गवर्नेंस' ने नागरिक आकांक्षाओं को केंद्र में रखा।
प्रेम शंकर झा। 17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं। यह अवसर व्यक्तिगत पड़ाव से अधिक उस शासन-यात्रा को देखने का है, जो 2014 से भारतीय प्रशासन और सार्वजनिक नीति के अनेक स्तरों पर दिखाई देती है। 10 जून 2026 को प्रधानमंत्री के रूप में लगातार 4,399 दिन पूरे करने के साथ नरेंद्र मोदी ने लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पार किया। इसी अवधि में केंद्र में उनकी सरकार ने 12 वर्ष पूरे किए।
लेकिन 4,399 दिनों का महत्व केवल कार्यकाल की लंबाई में नहीं है। किसी भी लंबे शासनकाल का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उसने प्रशासन के काम करने के तरीके, राज्य और नागरिक के संबंध तथा विकास की प्राथमिकताओं को किस सीमा तक प्रभावित किया।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों को इसी प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो एक ऐसी शासन-प्रक्रिया सामने आती है, जिसमें नीति निर्माण के साथ उसके अंतिम छोर तक क्रियान्वयन, तकनीक के साथ पारदर्शिता और कल्याण के साथ नागरिक की आकांक्षा को जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
इसी अर्थ में ‘मॉडिफाइड गवर्नेंस’ केवल कोई नारा नहीं, बल्कि शासन की बदलती कार्यसंस्कृति को समझने का एक उपयोगी ढांचा बनता है।
इस बदलाव की पहली और शायद सबसे महत्वपूर्ण परत वित्तीय समावेशन और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से जुड़ी है। जनधन, आधार और मोबाइल की त्रयी ने सरकार और नागरिक के बीच लेनदेन की पुरानी संरचना को काफी हद तक बदला। सितंबर 2026 तक प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत 59.21 करोड़ खाते दर्ज हैं, जिनमें 32.98 करोड़ महिला खाताधारक हैं। इन खातों में कुल जमा राशि 3.17 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
यह आंकड़ा केवल बैंक खाते खुलने का आंकड़ा नहीं है। इसका प्रशासनिक महत्व यह है कि राज्य द्वारा दी जाने वाली सहायता के लिए एक औपचारिक वित्तीय पहचान का विस्तार हुआ। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने अनेक योजनाओं में मध्यस्थता कम करने और लाभार्थी तक धन पहुंचाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया। इसी क्रम में डिजिटल भुगतान का विस्तार हुआ। अगस्त 2026 में यूपीआई पर 24,508.96 मिलियन लेनदेन हुए, जिनका मूल्य करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रहा।
यहीं से शासन में एक दूसरा परिवर्तन दिखाई देता है। कार्यालय से नागरिक तक पहुंचने वाली सेवाओं का डिजिटल रूपांतरण। डिजिटल भारत की अवधारणा ने प्रमाणपत्र, भुगतान, पहचान, कर प्रशासन और अनेक सार्वजनिक सेवाओं को ऑनलाइन मंचों से जोड़ा। इसका प्रभाव केवल सुविधा तक सीमित नहीं है। जब किसी सरकारी सेवा की प्रक्रिया डिजिटल होती है तो उसके साथ समय, रिकॉर्ड, निगरानी और जवाबदेही के नए आयाम भी जुड़ते हैं।
सरकार ने 2026 में डिजिटल भारत के 11 वर्ष पूरे होने पर भी सेवा वितरण, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को शासन परिवर्तन का प्रमुख आधार बताया।
प्रशासनिक संस्कृति में दूसरा बड़ा बदलाव निगरानी और क्रियान्वयन की शैली में आया। प्रगति मंच इसका उदाहरण है, जहां केंद्र और राज्यों से जुड़े महत्वपूर्ण परियोजनाओं तथा लंबित मामलों की नियमित समीक्षा होती है। जून 2026 में हुई 52वीं प्रगति बैठक में लगभग 30 हजार करोड़ रुपये की चार आधारभूत परियोजनाओं की समीक्षा की गई और केंद्र-राज्य स्तर पर लंबित मुद्दों को समयबद्ध तरीके से सुलझाने पर जोर दिया गया।
यह व्यवस्था इस मायने में महत्वपूर्ण है कि शासन में केवल निर्णय लेना पर्याप्त नहीं माना गया; निर्णय की प्रगति, अड़चन और परिणाम की समीक्षा भी उसी प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बनी। इसी सोच का विस्तार प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान में दिखाई देता है, जहां सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, औद्योगिक गलियारे और अन्य आधारभूत संरचनाओं को अलग-अलग विभागीय परियोजनाओं के बजाय एक-दूसरे से जुड़े तंत्र के रूप में देखने का प्रयास हुआ।
आधारभूत ढांचे पर जोर इस शासन-काल की एक स्पष्ट पहचान भी रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई वित्त वर्ष 2013-14 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर मार्च 2026 में 1,46,572 किलोमीटर हुई। चार लेन या उससे अधिक वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई भी 18,371 किलोमीटर से बढ़कर 45,516 किलोमीटर हुई। रेलवे विद्युतीकरण जुलाई 2026 तक 99.6 प्रतिशत तक पहुंचने का सरकारी आंकड़ा है। इसी अवधि में वंदे भारत जैसी नई पीढ़ी की रेल सेवाओं, अमृत भारत स्टेशन योजना और क्षेत्रीय हवाई संपर्क के विस्तार पर भी जोर दिया गया।
यहां आधारभूत ढांचे को केवल निर्माण के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। सड़क और रेल किसी अर्थव्यवस्था के लिए वही भूमिका निभाते हैं जो रक्त-प्रवाह शरीर के लिए है। बेहतर संपर्क का अर्थ बाजार तक पहुंच, माल की आवाजाही, रोजगार के अवसर और प्रशासनिक सेवाओं की पहुंच से भी है।
कल्याणकारी शासन के क्षेत्र में भी पिछले 12 वर्षों में दृष्टिकोण का विस्तार हुआ। जनधन से लेकर प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत और खाद्य सुरक्षा तक योजनाओं का जोर उन परिवारों तक पहुंच बढ़ाने पर रहा जिन्हें लंबे समय तक औपचारिक सेवाओं से बाहर माना जाता था। सरकार के अनुसार लगभग 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए हैं। वहीं मई 2026 तक ग्रामीण नल जल कनेक्शन 3.23 करोड़ परिवारों से बढ़कर 15.84 करोड़ परिवारों तक पहुंचने का सरकारी आंकड़ा है।
इन आंकड़ों का महत्व इस बात में है कि कल्याण की परिभाषा केवल अनुदान या सहायता तक सीमित नहीं रही। आवास, शौचालय, पेयजल, गैस, स्वास्थ्य सुरक्षा और बैंकिंग जैसी सुविधाओं को नागरिक की गरिमा और जीवन की गुणवत्ता से जोड़ने का प्रयास हुआ। हालांकि, किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था का अंतिम मूल्यांकन केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि यह देखने से होगा कि इन सुविधाओं की गुणवत्ता, निरंतरता और वास्तविक उपयोग कितना प्रभावी है।
कृषि, महिला सशक्तीकरण और युवा आकांक्षाओं को भी इसी व्यापक ढांचे में देखना चाहिए। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान क्रेडिट कार्ड, सिंचाई और कृषि अवसंरचना जैसी पहलों के साथ महिलाओं के बैंक खातों, उज्ज्वला, स्वयं सहायता समूहों और ‘लखपति दीदी’ जैसे कार्यक्रमों ने महिलाओं को लाभार्थी के साथ आर्थिक भागीदारी की भूमिका में लाने का प्रयास किया।
युवाओं के संदर्भ में स्टार्टअप इंडिया, कौशल विकास, अटल नवाचार मिशन और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने रोजगार खोजने वाले युवा के साथ रोजगार पैदा करने वाले युवा की अवधारणा को भी नीति विमर्श में प्रमुखता दी। सरकार के अनुसार 2025 तक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या दो लाख से अधिक हो चुकी थी।
अर्थव्यवस्था और विनिर्माण के मोर्चे पर भी शासन की प्राथमिकताओं में बदलाव दिखाई देता है। वस्तु एवं सेवा कर ने अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को एकीकृत करने का प्रयास किया, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता ने ऋण समाधान की प्रक्रिया को नया ढांचा दिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना ने विनिर्माण को प्रोत्साहित करने की कोशिश की।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में 2026 तक 12 विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी मिल चुकी थी, जिनमें 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का अनुमान है। यहां ‘आत्मनिर्भरता’ को केवल आयात घटाने के अर्थ में नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण तकनीकों, आपूर्ति श्रृंखलाओं और रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू क्षमता विकसित करने के प्रयास के रूप में देखना चाहिए। रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में इसी सोच का विस्तार दिखाई देता है।
इस शासन-यात्रा का एक और आयाम भारत की वैश्विक भूमिका और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। जी-20 की अध्यक्षता, कोविड काल में वैक्सीन मैत्री, वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति ने विदेश नीति को घरेलू विकास की प्राथमिकताओं से जोड़ने का प्रयास किया।
दूसरी ओर राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और महाकाल लोक जैसी परियोजनाओं के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन, नगरीय विकास और सार्वजनिक अवसंरचना से जोड़ने की कोशिश हुई। सरकार के विभिन्न बयानों में विकास और विरासत को परस्पर पूरक मानने की यही दृष्टि सामने आई है।
आकांक्षी जिलों और आकांक्षी ब्लॉकों की अवधारणा भी प्रशासनिक दृष्टि से उल्लेखनीय है। इसका केंद्र यह विचार है कि विकास का आकलन केवल राज्य या जिले के औसत आंकड़ों से नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों के प्रदर्शन से भी होना चाहिए जो पीछे रह गए हैं। इसी सोच में सीमावर्ती गांवों को ‘अंतिम गांव’ के बजाय विकास और संपर्क की मुख्यधारा में शामिल करने की दृष्टि भी दिखाई देती है।
फिर भी 12 वर्षों के बाद अगली कसौटी उपलब्धियों की संख्या नहीं, संस्थागत क्षमता की स्थायित्व होगी। भारत जैसे विशाल और विविध देश में सड़क, डिजिटल मंच या बैंक खाता बनाना एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन उसकी गुणवत्ता, रखरखाव, स्थानीय संस्थाओं की क्षमता, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता, रोजगार की पर्याप्तता तथा नागरिक सेवाओं की समान पहुंच उससे भी बड़ी प्रशासनिक चुनौती हैं। 2047 के विकसित भारत का लक्ष्य तभी संस्थागत रूप ले सकेगा जब इन क्षेत्रों में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ स्थानीय निकायों की क्षमता भी समान गति से मजबूत हो।
यही कारण है कि नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितनी योजनाएं शुरू हुईं या कितने किलोमीटर सड़क बनी। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या शासन अधिक परिणामोन्मुख, अधिक पारदर्शी, अधिक तकनीक-सक्षम और नागरिक की आकांक्षाओं के प्रति अधिक उत्तरदायी हुआ है। उपलब्ध नीतिगत बदलावों और सरकारी आंकड़ों से इन क्षेत्रों में स्पष्ट परिवर्तन के संकेत मिलते हैं। साथ ही अगला चरण इन परिवर्तनों को स्थायी संस्थागत व्यवस्था में बदलने की मांग करता है।
17 सितंबर का जन्मदिन इसलिए केवल एक राजनीतिक कार्यकाल की लंबाई गिनने का अवसर नहीं है। यह उस प्रशासनिक यात्रा को समझने का अवसर है, जिसमें राज्य की पहुंच का विस्तार हुआ, तकनीक शासन का महत्वपूर्ण औजार बनी, बुनियादी ढांचा विकास की केंद्रीय धुरी बना और कल्याण को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की कोशिश नीति का प्रमुख लक्ष्य बनी। 4,399 दिनों की यात्रा का अगला अर्थ इसी में है कि व्यक्ति से आगे बढ़कर संस्थाएं कितनी मजबूत होती हैं और शासन की यह नई कार्य-संस्कृति आने वाले भारत की प्रशासनिक विरासत में कितनी गहराई से स्थापित होती है।
यही ‘मॉडिफाइड गवर्नेंस’ की सबसे बड़ी कसौटी भी है। शासन केवल बदलता हुआ दिखाई दे, इतना पर्याप्त नहीं, उसकी क्षमता नागरिक के जीवन में स्थायी रूप से दिखाई दे।
प्रेम शंकर झा, एडीआरएम, मुरादाबाद (बहुचर्चित पुस्तक ‘मॉडिफाइड गवर्नेंस’ के लेखक)
