सिद्धार्थनगर, विजय श्रीवास्तव। भारत-नेपाल सीमा से लेकर नेपाल के करीब 30 किमी दूर तक गांव के किसानों की अधिकांश खेती भारतीय खाद पर निर्भर है। नेपाल में भारत के मुकाबले डीएपी व यूरिया खाद के दाम में काफी अंतर है। जो यूरिया भारत में 300 सौ रुपये प्रति बोरी मिलती है, वही नेपाल पहुंचने पर 600 रुपये हो जाती है। डीएपी 1500 से 1700 प्रति बोरी बिकती है। यही कारण है कि साल के बारह महीने खाद की तस्करी चरम पर रहती है। तस्कर व दुकानदार तो मालामाल हो रहे, लेकिन समय से खाद न मिलने पर भारतीय किसानों की खेती चौपट हो रही है।

तस्‍करी कर ले जाते हैं यूरिया

भारत में खाद के लिए किसान भले परेशान रहे, लेकिन पड़ोसी देश नेपाल में हमेशा भारतीय खाद देखे जा सकते हैं। छोटे-छोटे चौराहों पर दुकानदार खुले में भारतीय खाद की बिक्री करते हैं। तस्कर इतने चालाक होते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों के लाख जतन के बाद भी पकड़ में नहीं आते। कभी-कभार हाथ लगते भी हैं तो कैरियर। मेन तस्कर पकड़ में न आने से अंकुश नहीं लग पा रहा है। तस्करी के खेल में भारतीय किसान पिस जाते हैं। कई बार बार्डर पर किसानों को ही तस्कर समझ पकड़ लिया जाता है। हालांकि बाद में सबूत आदि पेश करने पर उन्हें छोड़ दिया जाता है। लेकिन तस्करों की पकड़ इतनी मजबूत है कि पुलिस की गिरफ्त में नहीं आते।

नेपाली खाद की यह कीमत

नेपाल में डीएपी खाद का दाम 3000 हजार रुपये प्रति बोरी है। जिसका भारतीय मूल्य 1850 रुपये से अधिक होता है। 50 किलो यूरिया का दाम 12 सौ के करीब है। जिसका भारतीय मूल्य 700 रुपये से अधिक है।

ऐसे होती है तस्करी

पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए तस्करों ने लग्जरी व अन्य गाडियों को लगाया है। दिन भर खाद लादकर सीमाई क्षेत्र के गांव में इकट्ठा करते हैं। समय देखते ही नेपाल पार कर देते हैं। इससे चाहकर भी यह पकड़ में नहीं आते।

यह रास्ता है मुफीद

सीमाई क्षेत्र के ठकुरापुर, पोखरभिटवा, गौरी, पकडिहवा, धनौरा, लालपुर, नरकुल, भैसहवां, हरिवंशपुर, ठोठरी आदि गांव के अगल-बगल व पगडंडियों के रास्ते नेपाल भेजते हैं।

खाद तस्करी की सूचना पर तत्काल कार्रवाई की जाती है। कुछ छोटे किसानों की खेती नेपाल में है। उन्हे आवश्यक दस्तावेज देखने के बाद खाद ले जाने की अनुमति दी जाती है। - अमित कुमार सिंह, कमांडेंट एसएसबी द्वितीय वाहिनी।

Posted By: Pradeep Srivastava

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