बैंकॉक, प्रेट्र। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में अपने हितों के साथ किसी तरह का समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि भारत यह देखेगा कि आरसेप समझौते में व्यापार, सेवाओं और निवेश पर उसकी चिंताओं को पूरी तरह से समायोजित किया जा रहा है या नहीं। प्रधानमंत्री मोदी तीन अहम सम्मेलनों में शामिल होने तीन दिन की यात्रा पर शनिवार को थाइलैंड पहुंचे।

प्रधानमंत्री मोदी तीन नवंबर को 16वें भारत-आसियान सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। जबकि, चार नवंबर को आरसेप संधि पर सदस्य देशों की तीसरी शिखर बैठक को संबोधित करेंगे। वह चार नवंबर को ही 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भी शिरकत करेंगे। आरसेप की लंबे समय से जारी वार्ता के अंतिम चरण में पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने 'उचित प्रस्तावों' को स्पष्ट तरीके से आगे रखा है। भारत मुक्त व्यापार के लिए 'ईमानदारी' से वार्ता कर रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत का स्पष्ट मानना है कि पारस्परिक रूप से लाभप्रद आरसेप, जिससे सभी पक्ष यथोचित लाभ प्राप्त करते हैं, वह भारत समेत वार्ता में शामिल अन्य सभी देशों के हित में है। उन्होंने कहा कि भारत शिखर बैठक में आरसेप की वार्ता में प्रगति की समीक्षा करेगा। प्रधानमंत्री ने यह टिप्पणी 10 आसियान देशों (दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ) और छह व्यापार देशों -भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के वार्ताकारों की बातचीत के दौरान की। आसियान देशों में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर, थाइलैंड, फिलीपींस, लाओस और विएतनाम शामिल हैं।

वहीं, विभिन्न राजनयिक सूत्रों ने इस बात पुष्टि की कि भारत को छोड़कर सभी 15 सदस्य देशों के बीच समझौते पर सहमति बन गई है और वह सोमवार की बैठक में इसे अंतिम रूप देने की कोशिश करेंगे। इससे पहले, थाइलैंड रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री ने एक बयान में कहा कि इस यात्रा के दौरान वह बैंकॉक में मौजूद कई विश्र्व नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। उन्होंने कहा, 'आसियान से संबंधित शिखर सम्मेलन हमारे कूटनीतिक कैलेंडर का एक अभिन्न अंग और हमारी 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का एक महत्वपूर्ण घटक है। आसियान के साथ हमारी साझेदारी संपर्क, क्षमता निर्माण, वाणिज्य और संस्कृति के प्रमुख स्तंभों पर बनी है।'

प्रधानमंत्री ने कहा कि वह आसियान भागीदारों के साथ सहयोगात्मक गतिविधियों की समीक्षा करेंगे और आसियान तथा उसके नेतृत्व को मजबूत करने वाले तंत्र की योजनाओं पर, संपर्क बढ़ाने पर (समुद्र, भूमि, वायु, डिजिटल और लोगों के बीच), आर्थिक भागीदारी को गहरा करने पर तथा समुद्री सहयोग के विस्तार पर भी गौर करेंगे।

क्या है आरसेप?

साल 2012 में शुरू हुआ क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी यानी आरसेप चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत का 10 सदस्यीय आसियान गुट के साथ एक व्यापार समझौता है। इसका उद्देश्य व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए इसके सदस्य देशों के बीच व्यापार नियमों को उदार एवं सरल बनाना है। इस साझेदारी से विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका बाहर है।

दुनिया का सबसे बड़ा होगा व्यापार समझौता

आरसेप पर अगर सदस्य देशों के बीच सहमति बन जाती है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा। इसके सदस्य 16 देशों में 3.5 अरब (दुनिया की आबादी 7.7 अरब है) लोग रहते हैं और दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा यहां है।

भारत में क्यों हो रहा विरोध?

आरसेप में भारत के शामिल होने को लेकर कुछ संगठन विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि भले ही यह बताया जा रहा है कि आरसेप से आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्ता के और सभी के लिए फायदेमंद व्यापार अनुबंध को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन सच्चाई यह है कि इससे असमानता, एकतरफा व्यापार व्यवस्था और पूंजीवादी नियंत्रण के कारण कारपोरेट नियंत्रण को बढ़ावा मिलेगा। रोजगार खत्म होने और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने चुनौतियां और गहरी होंगी।

चीन का बढ़ेगा दबदबा

आरसेप से अमेरिका के बाहर रहने से सीधा फायदा चीन को होगा। चीन इसका नेतृत्व भी कर रहा है। जानकारों का मानना है कि आरसेप से चीन का उसके पड़ोसी देशों में प्रभुत्व और बढ़ेगा, क्योंकि यहां उसे अमेरिका से बड़ी चुनौती नहीं मिलती है।

 

Posted By: Ayushi Tyagi

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