[अभिषेक रंजन सिंह]। पाकिस्तान में 25 जुलाई को संसदीय व प्रांतीय चुनाव होने हैं। चुनाव से पहले भ्रष्टाचार के मामले में नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इसके अलावा उनके आजीवन चुनाव लड़ने पर पाबंदी भी लगा दी गई। नवाज शरीफ और उनकी पार्टी पीएमएल (एन) की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं, बल्कि चुनाव से बीस रोज पहले लंदन की एवेनफील्ड मामले में उन्हें दस वर्षों की सजा सुनाई गई। साथ ही उनकी बेटी मरियम नवाज और उनके दामाद कैप्टन सफदर अवान को क्रमश: सात और एक वर्ष की सजा सुनाई गई। नवाज शरीफ इन दिनों लंदन में हैं। पीएमएल (एन) के नेताओं व कार्यकर्ताओं को भरोसा था कि नवाज शरीफ अपने उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार करेंगे, लेकिन नेशनल अकाउंटेबिलिटी बोर्ड (एनएबी) के फैसले से सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी रणनीति पर पानी फिर गया। मरियम और कैप्टन अवान नेशनल असेंबली के चुनाव में उम्मीदवार थे। लेकिन इस फैसले के बाद दोनों चुनावी मैदान से बाहर हो चुके हैं।

पंजाब के मुख्यमंत्री और नवाज शरीफ के छोटे भाई शाहबाज शरीफ को छोड़ दें तो पीएमएल (एन) में ऐसा कोई करिश्माई नेता नहीं जो अवाम को अपनी तरफ आकर्षित कर सके। लेकिन शाहबाज की हदें भी पंजाब सूबे तक सीमित हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) की तरफ से वह प्रधानमंत्री के दावेदार हैं और लाहौर के अलावा अन्य सीटों से भी वह चुनाव लड़ रहे हैं। फिलवक्त पार्टी की कमान भी उन्हीं के पास है। भारत में भी एक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की परिपाटी रही है। लेकिन पाकिस्तान के राजनेता इससे दो कदम आगे हैं। पीएमएल (एन) के अध्यक्ष शहबाज शरीफ इस बार लाहौर, डेरा गाजी खान, कराची और स्वात की सीट से चुनावी मैदान में हैं। वहीं पीएमएल (एन) के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी मुरी और इस्लामाबाद से चुनाव लड़ रहे हैं। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) अध्यक्ष इमरान खान इस्लामाबाद, बानू, मियांवली, लाहौर और कराची से चुनावी समर में हैं।

फौज की भूमिका

वर्ष 2013 के चुनाव में पीएमएल (एन) को भारी जीत मिली और नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सरकार के खिलाफ उन्होंने देशभर में रैलियां की थीं। लेकिन वक्त ने ऐसा करवट लिया कि वह आज खुद अपनी पार्टी के प्रचार अभियान से दूर हैं। पाकिस्तान में इस बार सत्तारूढ़ पीएमएल (एन) का मुख्य मुकाबला पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पीटीआइ के बीच है। लेकिन प्रचार के मामले में इमरान खान की अगुआई वाली पीटीआइ सबसे आगे है। साल 2013 के चुनाव में पीएमएल (एन) की रैलियां करीब-करीब हर सूबे में हुई थीं। लेकिन इस मर्तबा कार्यकर्ताओं में उतना उत्साह नहीं है। वहीं बिलावल भुट्टो सिंध से बाहर के राज्यों में कम रैलियां कर रहे हैं। जबकि इमरान खैबर पख्तूनख्वा, फाटा, पंजाब और सिंध में भी धुंआधार रैलियां कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि पंजाब में जहां पीएमएल (एन) काफी मजबूत है वहां भी उसने अपनी कई रैलियां मुल्तवी कर दी है। अपने विरोधियों के मुकाबले इमरान खान सोशल मीडिया पर काफी आगे हैं।

इमरान खान को पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान की सियासत में उन्होंने जो मकाम हासिल किया है इसे लेकर भी कई तरह के सवाल हैं। बाईस साल पहले वह क्रिकेट की दुनिया से राजनीति में आए। इसके पीछे फौज की भूमिका थी। जिस तरह नब्बे के दशक में जिया उल हक ने नवाज शरीफ को सियासत में ऊपर उठाया। लेकिन बाद के दिनों में फौज और नवाज शरीफ के रिश्तों में आई तल्खी सबों ने देखी।

पाकिस्तान में लोकतंत्र

यह दूसरा मौका है जब पाकिस्तान की कोई चुनी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। लोकतंत्र में यकीन रखने वाले इससे खुश हैं। जबकि सेना और आइएसआइ के लिए यह मुफीद नहीं है। इसलिए फौज के पोस्टर ब्वॉय के रूप में शुमार इमरान को पाकिस्तान के चुनावी समर में उतारा गया। उनकी चुनावी तकरीरों में वह पाकिस्तान की बदहाली के लिए पीएमएल (एन) और पीपीपी को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन पाकिस्तान में जम्हूरियत का आधा समय फौजी शासन में बीता इसका उन्हें कोई इलहाम नहीं। पिछले दिनों एक रैली में इमरान ने कहा, ‘पाकिस्तान की मजबूत फौज ने हमेशा मुल्क की हिफाजत की है और सियासत में अहम किरदार निभाया है। फौज की शान में कसीदे पढ़ने का यह इकलौता वाकया नहीं है। मियांवली और कोहाट में भी उन्होंने सेना की जमकर तारीफ की। जिस सीपैक को लेकर पाकिस्तान में विरोध है, उस प्रोजेक्ट को वह पाकिस्तान का मुस्तकविल करार दे रहे हैं।

आतंकी भी मैदान में

वैश्विक आतंकवादी हाफिज सईद भी चुनाव के दौरान काफी सुर्खियों में है। मिल्ली मुस्लिम लीग बनाकर हाफिज सईद सियासत में आने का फैसला किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग ने मिल्ली मुस्लिम लीग को मान्यता देने से मना कर दिया। लिहाजा हाफिज सईद अपने उम्मीदवारों को अल्लाह-हू-अकबर नामक एक संगठन से खड़ा किया है। अल्लाहहू-अकबर ने करीब 259 उम्मीदवार उतारे हैं जिनमें हाफिज सईद का दामाद भी शामिल है। ऐसा पहली बार है जब बड़े पैमाने पर दहशतगर्द चुनाव लड़ रहे हैं। यह सही है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र संगीनों के साये में रहा। लेकिन सात दशकों में वहां कोई धार्मिक-कट्टरपंथियों की सरकार नहीं बनी। क्योंकि अवाम का समर्थन उन्हें हासिल नहीं है। लेकिन इस बार पूरी तैयारी के साथ दहशतगर्द चुनाव मैदान में हैं। अगर इमरान खान को सेना की सरपरस्ती हासिल है तो फिर धार्मिक-कट्टरपंथी राजनीतिक दलों पर वह दांव क्यों लगा रही है। दरअसल तहरीक-ए- तालिबान पाकिस्तान जैसे संगठन सेना के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। इससे निपटने के लिए सेना दहशतगर्दों को अपने पनाहगार से निकालकर सियासी मैदान में उतार रही है। पाकिस्तान की ज्यादातर संवैधानिक संस्थानों पर फौज का ही सिक्का चलता है। न्यायपालिका व चुनाव आयोग पर भी फौज का असर दिखने लगा है।

पंजाब की अहमियत

पाक की राजनीति में पंजाब की अहमियत सबसे ज्यादा है। उसके बाद सिंध का स्थान है। पंजाब पीएमएल (एन) का मजबूत गढ़ है। नेशनल असेंबली की कुल सीटों में आधी सीटें पंजाब से आती हैं। नवाज की गैर मौजूदगी से पीएमएल (एन) के कार्यकर्ता हताश हैं और इसका फायदा इमरान को मिल सकता है। यही वजह है कि उन्होंने लाहौर से भी उम्मीदवारी का पर्चा भरा। लाहौर समेत पंजाब के लगभग सभी जिलों में उन्होंने रैलियां की हैं। उनके मुकाबले पीपीपी ने काफी कम रैलियां की हैं। बिलावल भुट्टो अपनी पार्टी के एकमात्र चेहरा हैं, जो अवाम को अपनी तरफ ला सकते हैं। उनकी इस काबिलियत में उनसे ज्यादा बेनजीर भुट्टो का नाम है। साल 2008 में हुए चुनाव में बेनजीर भुट्टो पीपीपी की तरफ से प्रधानमंत्री की उम्मीदवार थीं। रावलपिंडी में चुनाव प्रचार के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। बेनजीर की शहादत का फायदा पीपीपी को मिला। चुनावी में पीपीपी 119 सीटें जीतकर सरकार बनाने में सफल रही। 2013 के चुनाव आते-आते पीपीपी अपने नेताओं की वजह से अवाम के बीच अपनी काफी फजीहत करा चुकी थी। इनमें पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उनके बेटे बिलाबल भुट्टो भी शामिल हैं।

सिंध में रोचक मुकाबला

पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी के साथ-साथ वहां सियासत में अहम किरदार निभाने वाले सिंध में भी चुनावी मुकाबला काफी रोचक है। यहां अल्ताफ हुसैन मुहाजिरों के एकमात्र नेता हैं। लेकिन उनकी पार्टी मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) इस बार संसदीय और प्रांतीय चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है। नतीजतन सिंध में पीपीपी और पीटीआइ के बीच मुकाबला है। भारत से आए काफी मुसलमान सिंध में रहते हैं। बिलावल भुट्टो जरदारी और इमरान खान दोनों की नजरें इस वोटबैंक पर टिकी हैं। यही वजह है कि उन्होंने कराची के उन इलाकों में रैलियां कीं जहां एमक्यूएम का दबदबा है। लेकिन सिंध में रहने वाले अल्ताफ समर्थक अपना वोट पीपीपी को ही देंगे। ऐसा इसलिए कि एमक्यूएम और पीपीपी साथ मिलकर सिंध में सरकार बना चुके हैं। एमक्यूएम प्रमुख अल्ताफ हुसैन का आरोप है कि यह चुनाव एक दिखावा है और इसके जरिये फौज अपनी मनमाफिक सरकार बनाना चाहती है। वैसे अल्ताफ हुसैन के आरोपों को गलत नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल सेना नहीं चाहती कि पीएमएल (एन) दोबारा सत्ता में आए। इस मंसूबे को पूरा करने में सेना काफी पहले से जुटी है।

महिलाओं की भागीदारी

इन सबके बीच पाकिस्तान की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। इस बार वहां के चुनाव इतिहास में पहली बार बड़ी संख्या में महिला प्रत्याशी हैं। नेशनल असेंबली की 272 सामान्य सीटों पर 171 महिला उम्मीदवार चुनाव लड़ रही हैं। इनमें 105 महिला उम्मीदवार विभिन्न पार्टियों से उम्मीदवार बनाई गई हैं। जबकि 66 महिला प्रत्याशी बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान में हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सबसे ज्यादा उन्नीस महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया है। इनमें ग्यारह पंजाब से पांच सिंध से और खैबर पख्तूनख्वा से तीन महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है। गौरतलब है कि सिंध से एक हिंदू महिला उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में है।

बदला-बदला सा शीर्ष नेतृत्व

बीते तीन दशकों में यह पहला आम चुनाव है जब पाकिस्तान की दो सबसे पुरानी पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व बदल गया। देखने वाली बात होगी कि देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाली पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में कौन अव्वल आता है। पीएमएल (एन) और पीपीपी ने पाकिस्तान को नौ प्रधानमंत्री दिए। जिसमें पीएमएल (एन) के पांच और पीपीपी के चार प्रधानमंत्री शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि 1990 में पाकिस्तान मुस्लिम लीग से अलग होकर नवाज शरीफ ने पीएमएल (एन) बनाई। उसके बाद उनकी पार्टी जब भी सत्ता में आई वह प्रधानमंत्री बने। इस तरह पाकिस्तान में सबसे अधिक चार बार प्रधानमंत्री बनने वाले अकेले शख्स हैं। पीपीपी का गठन जुल्फिकार अली भुट्टो ने किया। उनकी मौत के बाद बेनजीर भुट्टो को पार्टी की कमान सौंपी गई। पाकिस्तान बदर होने के बाद भी वह पीपीपी की अध्यक्ष बनी रहीं।

2007 के आम चुनाव प्रचार के दौरान उनकी हत्या होने के बाद पार्टी की कमान उनके पति आसिफ अली जरदारी को मिली। लेकिन 2013 के चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद बेनजीर के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी ने पीपीपी की कमान संभाली। पाकिस्तान में इस बार चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जा रहा है। बिलावल भुट्टो इस बार भी लियारी संसदीय सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। बेनजीर भुट्टो और जुल्फिकार अली भुट्टो भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वहीं पीएमएल (एन) भी इस बार शाहबाज शरीफ के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। इन दोनों पार्टियों के मुकाबले इमरान की पीटीआइ एक नई पार्टी है। शरीफ और भुट्टो खानदान की तरह सियासत उन्हें विरासत में नहीं मिली। अलबत्ता यह तो पाकिस्तान के चुनावी नतीजे बताएंगे कि वहां कि अवाम क्या कोई तीसरा विकल्प चुनेगी।

पाकिस्तान में इस बार पीपीपी बिलावल भुट्टो तो पीएमएल (एन) शाहबाज शरीफ के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही हैं। इन दोनों राजनीतिक पार्टियों के मुकाबले इमरान खान की पीटीआइ अपेक्षाकृत एक नई पार्टी है। शरीफ और भुट्टो खानदान की तरह सियासत उन्हें विरासत में नहीं मिली है। बहरहाल यह तो पाकिस्तान के चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि वहां कि अवाम क्या कोई तीसरा विकल्प चाहती है या नहीं।

[राजनीतिक विश्लेषक] 

By Sanjay Pokhriyal