नई दिल्ली, जयप्रकाश रंजन। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते जिस मुकाम पर पहुंच गये हैं, वहां एक दूसरे के यहां पीएम या विदेश मंत्री का दौरा होना अभी बहुत मुश्किल है। लेकिन हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं कि पाक के विदेश मंत्री को नवंबर, 2020 में भारत का दौरा करना पड़ सकता है। दरअसल, शंघाई सहयोग संगठन (सीएसओ) के सदस्य देशों के सरकारों के प्रमुखों की बैठक भारत में होना सुनिश्चित किया गया है। आम तौर पर यह प्रधानमंत्री स्तर की बैठक होती है लेकिन भारत व पाकिस्तान अभी तक इसमें अपने विदेश मंत्रियों को भेजते रहे हैं। अब देखना होगा कि मौजूदा रिश्तों की तल्खी को देखते हुए पाक सरकार अपने विदेश मंत्री को इसमें भेजती है या नहीं।

पीएम स्तरीय बैठक में पाक व भारत के विदेश मंत्री लेते हैं हिस्सा

सीएसओ के महासचिव व्लादिमीर नोरोव के मुताबिक भारत व पाकिस्तान दोनों वर्ष 2017 में ही सीएसओ के सदस्य बने हैं और पहली बार इस संगठन की एक महत्वपूर्ण बैठक भारत में होने जा रही है। दैनिक जागरण ने उनसे पूछा कि क्या इसमें पाकिस्तान के पीएम भाग ले सकते हैं तो उन्होंने कहा कि, ''क्यों नहीं। यह आठ सदस्यीय सीएसओ के राष्ट्र प्रमुखों की सालाना होने वाली बैठक के बाद दूसरी सबसे अहम बैठक होती है। भारत और पाकिस्तान में संसदीय व्यवस्था है इसलिए ये दोनों देश इस बैठक में अपने विदेश मंत्रियों को बतौर पीएम के प्रतिनिधि भेजते हैं।''

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पाक अपने विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को भारत भेजता है या नहीं। अगर ऐसा होता है तो मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद पहली बार पाकिस्तान का कोई बड़ा नेता भारत आएगा। वर्ष 2016 जब भारत व पाकिस्तान के रिश्ते बेहद तल्ख थे, तब भी तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इस्लामाबाद गये थे।

भारत-पाक के रिश्तों में घुले तनाव को खत्म करेगा

रूस और चीन के वरिष्ठ नेता पूर्व में यह कह चुके हैं कि सीएसओ आने वाले दिनों में भारत-पाक के रिश्तों में घुले तनाव को खत्म करेगा। यह भी बता दें कि वर्ष 2023 में सीएसओ के राष्ट्र प्रमुखों की सालाना बैठक भारत में ही होगी तब पाकिस्तान के पीएम को इसमें हिस्सा लेने आना पड़ सकता है। सीएसओ के राष्ट्र प्रमुखों की वर्ष 2015 की बैठक में ही पीएम नरेंद्र मोदी और पाक पीएम नवाज शरीफ के बीच बात हुई थी, जिसके बाद रिश्तों को सुधारने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

इसके बाद दोनों देशों के एनएसओ और विदेश सचिवों की बैंकाक में बैठक हुई थी और उसके बाद तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस्लामाबाद की यात्रा की थी जिसमें समग्र वार्ता शुरू करने की सहमति बनी थी। लेकिन पठानकोट हमले के बाद सारे किये धरे पर पानी फिर गया और उसके बाद दोनो देशों के रिश्ते लगातार बद से बदतर होते गये। इसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई।

सीएसओ के मंच के रूप में भारत दे रहा ज्‍यादा तवज्‍जो

अब दोनो देश सीएसओ के सदस्य हैं, जिसे चीन व रूस एक बड़े संगठन के तौर पर विकसित करने की मंशा रखते हैं। अभी इसमें चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान सदस्य हैं जबकि ईरान, अफगानिस्तान, बेलारूस और मंगोलिया इसके आब्जर्वर देश हैं।

माना जाता हैं कि इन चारों को जल्द ही इसकी पूर्ण सदस्य मिलेगी, जबकि अर्मेनिया, अजरबेजान, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका व तुर्की इसके डॉयलाग पार्टनर हैं। नोरोव ने बताया कि 10 और देशों ने डॉयलाग पार्टनर बनने का आवेदन किया है। सीएसओ के एक शक्तिशाली मंच बनते देख भारत इसे ज्यादा तवज्जो देता है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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