जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। दुनिया के सबसे मजबूत ट्रेड ब्लॉक के तौर पर प्रचारित आरसेप (RCEP)में भारत शामिल नहीं होगा। बैंकॉक में सोमवार को आरसेप (RCEP)वार्ता के लिए तैयार 16 देशों के शीर्ष नेताओं की बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी ने दो टूक कह दिया कि मौजूदा वैश्विक हालात और समझौते के प्रारुप में उसके हितों व मुद्दों को पूरा स्थान नहीं दिए जाने की वजह से भारत इसमें शामिल नहीं होगा। अब भारत के बगैर ही एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 15 बड़े देश आरसेप यानी रिजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप नाम से गठित होने वाले मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाएंगे। माना जा रहा है कि सस्ते आयात से अपने उद्योग-धंधों को बचाने के प्रति समझौते में खास प्रावधान नहीं होने की वजह से ही भारत ने अंतत: इससे बाहर होने का फैसला किया है।

ना तो गांधीजी के सिद्धांत और ना ही मेरा जमीर आरसेप में शामिल होने की दे रहा है अनुमति : मोदी

आरसेप के शीर्ष नेताओं की बैठक को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि भारत आरसेप (RCEP) में शामिल नहीं होगा और इसके लिए ना तो गांधी के सिद्धांत और ना ही उनका जमीर इस समझौते में शामिल होने की इजाजत दे रहा है। यह फैसला एक आम भारतीय के जीवन और उसके जीवनयापन के साधनों खास तौर पर समाज के बेहद निचले तबके के जीवन पर पड़ने वाले असर को देखते हुए किया जा रहा है।

पीएम ने यह भी साफ तौर पर बताया कि आरसेप (RCEP) का मौजूदा मसौदा पत्र इसके मूलभूत सिद्धांतों के मुताबिक नहीं है और कुछ मूल मुद्दों के साथ भारत कोई समझौता नहीं कर सकता। इसके साथ ही पीएम मोदी ने आरसेप के उन देशों को लताड़ भी लगाई जो भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में है। उन्होंने कहा, मुझे यह बताने में कोई गुरेज नहीं कि अब वे दिन नहीं है जब बड़ी शक्तियां भारत पर वैश्विक सौदेबाजी करने का दबाव बना देती थी। बढ़ते कारोबारी घाटे में कटौती करना और भारतीय सेवाओं व निवेश के लिए समान मौका मिलना भारत की दो प्रमुख मांग थी जिसके प्रति सदस्य देशों ने गंभीरता नहीं दिखाई है।

भारत के गरीब तबके पर हो सकता है बड़ा असर

इस बैठक में शामिल विदेश मंत्रालय में सचिव (पूर्व) विजय ठाकुर सिंह ने बाद में बताया, पीएम ने स्पष्ट किया कि हम गांधी जी के इस सिद्धांत के अनुसार चल रहे हैं कि जब भी इस तरह का कोई फैसला करना हो तो समाज के सबसे गरीब व्यक्ति को होने वाले फायदे या नुकसान पर सोचना चाहिए। हमारा मानना है कि इस समझौता से भारत के गरीब तबके पर इसका बड़ा असर हो सकता है। सनद रहे कि आरसेप (RCEP) के खिलाफ पूरे देश में पिछले कुछ दिनों से जबरदस्त मुहिम शुरू हो गई थी। किसान संघों से लेकर विपक्षी दल और भारतीय उद्यमी भी इसके खिलाफ लामबंद हो चुके थे। माना जा रहा था कि यह समझौता भारतीय बाजार को चीन के मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों और न्यूजीलैंड व ऑस्ट्रेलिया के कृषि उत्पादों से पाट देगा। यह छोटे व मझोले उद्यमियों के साथ ही भारतीय किसानों के हितों को भी नुकसान पहुंचाएगा।

RCEP के लिए भारत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद!  

आरसेप (RCEP) के शीर्ष नेताओं की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि भारत की तरफ से कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनका अभी तक समाधान नहीं निकल पाया है। सभी आरसेप के सदस्य इन मुद्दों को सुलझाने के लिए आपस में बात करेंगे, ताकि सभी पक्षों की सहमति के मुताबिक आगे का रास्ता निकल सके। भारत सरकार की तरफ से तो इस तरह से बताया गया है कि आरसेप के लिए उसने अपने दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिया है। सचिव (पूर्व) सिंह ने यह भी अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ ऐसा ही इशारा किया, लेकिन ऑस्ट्रेलिया व थाईलैंड के नेताओं ने अलग से कहा है कि आगे भारत के लिए इस समझौते में शामिल होने का रास्ता खुला रहेगा। इन फैसलों के आधार पर भी भारत का अंतिम फैसला निर्भर करेगा। बहरहाल, आरसेप के सदस्य शेष 15 देश वर्ष 2020 में इसे लागू करने का समझौता करेंगे।

क्या होगा असर

भारत का यह फैसला आरसेप (RCEP) के देशों के लिए एक करारा झटका माना जा रहा है, क्योंकि चीन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों की नजर भारत के विशाल घरेलू बाजार पर थी। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इस फैसले का कुछ नकारात्मक असर भी भारत को झेलना पड़ सकता है। खास तौर पर तब जब भारत की लुक ईस्ट नीति बेहद अहम रणनीतिक मुकाम पर पहुंच रही है। कई लोग यह मानते हैं कि आसियान के दस सदस्य अगर पिछले कुछ वर्षो से भारत के प्रति ज्यादा उदारता दिखा रहे थे तो उसके पीछे आरसेप ही था। साथ ही, आरसेप के सदस्य देश वैश्विक उद्योग जगत में एक श्रृंखला स्थापित करने की मंशा रखते हैं और भारत इसका हिस्सा नहीं रहेगा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या भारत एक बड़े औद्योगिक श्रृंखला का सदस्य बनने से वंचित रह गया है? इन सवालों का जवाब अभी देना मुश्किल है। 

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