डा. लक्ष्मी शंकर यादव। चीन ने लैंड बार्डर्स ला यानी जमीनी सीमा कानून बनाते हुए पड़ोसी देशों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। भारत के संदर्भ में वह भले ही यह कहता आया है कि भारत और चीन के बीच सीमा की पहचान कभी की ही नहीं गई। लेकिन भारत ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा है कि कुछ इलाकों के लिए भले ही यह बात सही हो, लेकिन पूरी सीमा के लिए ऐसा नहीं है। दोनों देशों के बीच हमेशा ऐतिहासिक आधार की पारंपरिक सीमा रही है। चीन की नेशनल कांग्रेस की स्थायी समिति द्वारा दी गई इस कानून की मंजूरी के बाद भारत से उसका विवाद बढ़ सकता है। इसमें कहा गया है कि यह सीमा सुरक्षा को मजबूत करने, आर्थिक एवं सामाजिक विकास को मदद देने, सीमावर्ती क्षेत्रों को खोलने, ऐसे क्षेत्रों में जनसेवा और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने, उसे बढ़ावा देने और वहां के लोगों के जीवन एवं कार्य में मदद देने का कार्य करेगा।

इस कानून के अनुसार चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की ऐसी पवित्रता होगी जिसमें किसी तरह का फेरबदल नहीं हो सकेगा अर्थात जिस जमीन पर चीन का आधिपत्य है, वह जमीन चीन की मानी जाएगी। यदि इससे पीछे हटा जाता है तो यह माना जाएगा कि लैंड बार्डर्स ला का उल्लंघन किया जा रहा है। अब यदि ऐसा होता है तो भारत-चीन सीमा विवाद हल नहीं हो सकेंगे। जब चीन भारत की सीमा में आगे बढ़ेगा तो भारत इसका विरोध करेगा और भारत के विरोध पर जब चीन वापस लौटेगा तो उसकी सेना को ऐसा लगेगा कि वे अपने लैंड बार्डर्स ला का उल्लंघन कर रहे हैं। यह स्थिति दोनों देशों के बीच विवाद को और बढ़ा देगी। लैंड बार्डर्स ला के दो पहलू निकल कर सामने आ रहे हैं। पहला यह है कि चीन इसके सहारे अपने पड़ोसी देशों के साथ चल रहे सीमा विवादों को आसानी से निपटा सकेगा और दूसरा जो जमीन उसके कब्जे में है उसे चीन खाली नहीं करेगा।

चीन के नए कानून का उद्देश्य किसी से छिपा नहीं है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि चीन ने यह चाल ऐसे समय पर चली है जब भारत के साथ पिछले करीब 19 माह से सीमा विवाद चल रहा है तथा टकराव की स्थिति बार-बार उत्पन्न हो रही है। चीन ने जिस तरह से अक्साई चिन को अपने आधिपत्य में लिया, अब उसी तरह से पूर्वी लद्दाख में गलवन घाटी पर अपना कब्जा जमाना चाहता है। चीन की सीमा 14 देशों से लगती है और वह करीब 12 देशों की जमीनों पर कब्जा करना चाहता है। वर्तमान में वह 23 देशों की जमीन और सामुद्रिक सीमाओं पर अपना दावा जताता है। चीन अब तक दूसरे देशों की लगभग 41 लाख वर्ग किलोमीटर जमीन पर अपना आधिपत्य जमा चुका है। आधिपत्य में ली गई यह भूमि चीन की कुल भूमि का लगभग 43 प्रतिशत है।

चीन यह भी दावा कर रहा है कि उसने अब तक अपनी सीमा से लगने वाले 12 देशों से अपने सीमा विवाद सुलझा लिए हैं, लेकिन भारत व भूटान से सीमा विवादों का समाधान निकालना बाकी है। यहां यह जानना उचित होगा कि भूटान की तुलना में भारत-चीन सीमा विवाद सुलझना अधिक पेचीदा एवं गंभीर मसला है। इस कानून से चीन को उन इलाकों में अधिक फायदा होगा जहां उसने गलत तरीके से सीमाई इलाकों में निर्माण कर लिए हैं। ऐसे में अरुणाचल व सिक्किम से लगी सीमाओं पर चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां चिंता पैदा करने वाली हैं। पिछले साल जून में गलवन घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमला चीन के सैनिकों ने ही किया था। ये घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि चीनी कानून का उद्देश्य भारत से सटी सीमा पर किए गए निर्माण पर अपनी वैधता प्रदान करना ही है।

चीन सीमाई इलाकों में वर्ष 2016 से ही निर्माण कार्यो में लगा हुआ है और बड़ी संख्या में गांवों को बसा चुका है। इन क्षेत्रों में सीमा के नजदीक तक सड़कें भी बनाई जा चुकी हैं। इन सड़कों की संख्या 100 से ज्यादा हो चुकी है। इसके अलावा चीन का रेल नेटवर्क भारतीय सीमा के काफी नजदीक तक आ चुका है। ये सभी रेल, गांव व सड़कें युद्ध के समय सामरिक बढ़त प्रदान करेंगे। चीन भारत ही नहीं, बल्कि साइबेरिया और म्यांमार के सीमाई इलाकों में भी अपनी गतिविधियों को बढ़ा रहा है। अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्जे के बाद चीन उधर भी अपनी गतिविधियां बढ़ा सकता है।

पूर्वी चीन सागर के आठ द्वीपों पर नजर : ताइवान पर चीन की पूरी नजर है, लेकिन वह डटकर उसके सामने मोर्चा लिए खड़ा रहता है और अमेरिका उसकी मदद को तैयार रहता है। इसलिए चीन हमला नहीं कर पा रहा है। पूर्वी चीन सागर के आठ द्वीपों पर चीन की नजर है, जिस कारण जापान से तनाव जारी है। रूस के साथ 52 हजार किलोमीटर क्षेत्र पर चीन का विवाद है। दक्षिण चीन सागर में जमीन हड़पने की नियति के कारण चीन का इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, सिंगापुर, ब्रुनेई व ताइवान आदि देशों से तनाव चल रहा है। दक्षिण चीन सागर के लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र पर चीन अपना दावा जता रहा है। यहां पर चीन अपने कई सैन्य अड्डे भी बना चुका है।

भारत ने जताई चिंता : चीन के इस कानून का अपने सीमा विवाद पर संभावित असर को देखते हुए भारत ने इसे चिंताजनक करार देते हुए चीन का मनमाना रवैया बताया है। विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि वर्ष 1963 में चीन और पाकिस्तान के बीच किया गया समझौता भी पूरी तरह से अवैध और गैर कानूनी है। उल्लेखनीय है कि इसी समझौते के तहत पाकिस्तान ने गैर कानूनी तरीके से भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से को चीन के हवाले कर दिया था। बदले में चीन ने भी उसे कुछ हिस्सा दिया था। कुल मिलाकर चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के कारण एलएसी पर हुए घटनाक्रमों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अमन चैन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है जिसे अब दोनों देशों को दूर करना होगा।

उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश एवं लद्दाख से लगती सीमा पर चीन की बढ़ती हरकतों के बाद भारत पूरी तरह से चौकन्ना हो गया है। राफेल विमानों की तैनाती लद्दाख सीमा पर की जा चुकी है ताकि चीन की किसी भी हरकत से निपटा जा सके। मिटियार मिसाइलों से लैस राफेल विमान चीन के लिए बेहद घातक सिद्ध होंगे। यह दो इंजनों वाला लड़ाकू विमान है और एक साथ कई हथियारों को ले जा सकने में सक्षम है। परमाणु हथियारों को ले जाने की क्षमता वाला यह विमान अत्याधुनिक मिसाइलों से लैस है। यह विमान इजराइली माउंटेड डिस्प्ले, राडार वार्निग रिसीवर्स, लो बैंड जैमर्स, इंफ्रारेड सर्च सिस्टम व 10 घंटे की फ्लाइट डाटा की रिकार्डिग जैसे सिस्टम से लैस है। लगभग 22 सौ किमी प्रति घंटे की गति से उड़ने वाले इस विमान का राडार 100 वर्ग किमी के दायरे में 40 लक्ष्यों की जानकारी एक साथ देता है जिससे शत्रु के लक्ष्यों को निशाना बनाना आसान होता है।

तेजस लड़ाकू विमान भी मिग-21 की जगह ले रहे हैं। इसके अलावा सुखोई-30 एमकेआइ विमान भी चीन से टक्कर लेने को तैयार हैं। ये विमान हवा से जमीन में मार करने वाले बेहद खतरनाक माने जाते हैं। वायु सेना के बेड़े में मिग-29 मल्टी रोल एयरक्राफ्ट और जगुआर जैसे हर मौसम में लड़ाई के तैयार रहने वाले लड़ाकू विमान भी हैं। ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस सुखोई विमान लद्दाख सीमा पर तैनात हैं। वायु सेना मिराज-2000 और जगुआर विमानों का भी इस्तेमाल करती है। ये अत्यंत तेज गति वाले विमान हैं। चीन से लगती सीमा के पास प्रमुख हवाई अड्डों पर दुनिया के सबसे हाईटेक मल्टीरोल हेलीकाप्टर अपाचे एवं चिनूक हर चुनौती से निपटने में सक्षम हैं।

भारत ने अरुणाचल के पास पहाड़ी इलाकों में इजराइल निर्मित हेरान ड्रोन तैनात कर रखे हैं। ये ड्रोन विमान सीमाई इलाकों के महत्वपूर्ण चित्र एवं आंकड़े नियंत्रण कक्ष को भेज रहे हैं। इन इलाकों में उन्नत हेलीकाप्टर रुद्र की तैनाती कर दी है। अब निगरानी को ‘सेंसर टू शूटर’ योजना के तहत और बढ़ाया गया है ताकि किसी भी संभावित अभियान के लिए सैन्य बल की त्वरित तैनाती की जा सके। एडवांस्ड लाइट हेलीकाप्टर रुद्र अमेरिका से लाए गए अपाचे हेलीकाप्टर से भी बेहतर है। हाई एल्टीट्यूड वारफेयर में रुद्र का पलड़ा अपाचे से भारी है। चीन की ओर से तैनात जेड-19 लड़ाकू हेलीकाप्टर इसके सामने कहीं नहीं ठहरता है। एलएसी के निकट चीन ने जिन जगहों पर अपने ठिकाने बनाए हैं और जहां पर टैंक व बख्तरबंद गाड़ियां तैनात कर रखे हैं, वहां पर यह हेलीकाप्टर आसानी से पहुंच सकता है। रुद्र की मुख्य गन 20 मिलीमीटर की है जो पायलट के हेलमेट से जुड़ी होती है। इसका फायदा यह है कि पायलट जिधर देखेगा निशाना उधर लगता जाएगा।

अरुणाचल प्रदेश सीमा के नजदीक पहाड़ों पर अत्याधुनिक एल-70 विमानभेदी तोपों को तैनात कर दिया गया है। आधुनिक किस्म की एल-70 विमानभेदी तोपें अपना लक्ष्य खोजकर उस पर गोला दागती हैं। सभी तरह के मौसम में मार करने में सक्षम ये तोपें इलेक्ट्रो-आप्टिकल सेंसर से सुसज्जित हैं। ये तोपें थर्मल इमेजिंग कैमरे से भी लैस हैं। इसके साथ ही इन तोपों को वैलोसिटी राडार से लैस किया गया है ताकि ये दूर से अपने लक्ष्य को देख सकें। इनकी मारक क्षमता 35 किलोमीटर तक है। इन इलाकों में एम-777 होवित्जर तोपों को भी तैनात किया गया है। यहां पर स्वीडन निर्मित बोफोर्स तोपें भी तैनात हैं।

लद्दाख क्षेत्र में पिछले वर्ष एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर तोपें तैनात की गई थीं जिनकी भूमिका ठीक रही थी। इन्हें भारत की फायर शक्ति की रीढ़ माना जाता है। पूर्वी लद्दाख के सीमाई क्षेत्र में के-9 वज्र तोपों की तैनाती कर दी गई है। यह तोप पहाड़ों पर अत्यंत ऊंचाई पर लंबी दूरी तक मार करते हुए शत्रु के ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है। इन तोपों की पांच रेजीमेंट यानी 100 तोपें मौजूद हैं। यह एक स्वचालित तोप है। इसकी मारक क्षमता 38 किमी है। यह तोप चारों तरफ हमला करती है। यह 47 किलोग्राम का गोला फेकने की क्षमता रखती है। मात्र 15 सेकंड में शत्रु पर यह तीन गोले गिराने में सक्षम है। ऐसी तोपें चीन की सीमा पर जब तैनात रहेंगी तो दुश्मन का चिंतित रहना स्वाभाविक है।

[पूर्व प्राध्यापक, सैन्य विज्ञान विषय]

Edited By: Sanjay Pokhriyal