नई दिल्ली, जयप्रकाश रंजन। पिछले महीने समूह-20 की सालाना शीर्ष बैठक के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने कुछ घंटे के अंतराल पर जापान के पीएम शिंजो एबी व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन व चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ मुलाकात कर भारत की बदली कूटनीतिक सक्रियता का संकेत दे दिया था।

विदेश मंत्रालय के बेहद वरिष्ठ अधिकारी अब मान रहे हैं कि निकट भविष्य में अमेरिका और रूस-चीन के नेतृत्व में उभर रहे धुरी के बीच सामंजस्य बनाना भारत की सबसे बड़ी चुनौती होगी। विदेश मंत्रालय का संकेत यह भी है कि वह इस बार 'कोल्ड-वार' काल वाली गलती नहीं दोहराएगा यानी वह किसी एक पक्ष में होने के बजाये दोनो पक्षों के साथ रिश्ते को बना कर रखेगा। यानी वह चीन-रूस के साथ अमेरिकाज-जापान की धुरी के साथ भी अपने रिश्तों को बनाए रखेगा।

विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में दो और चुनौतियां महत्वपूर्ण होंगी। दूसरी चुनौती होगी देश के आर्थिक हितों की रक्षा करना। यह अगली केंद्र सरकार के लिए सबसे अहम चुनौती होगी क्योंकि हर बड़ा देश अभी अपने आर्थिक हितों को कूटनीतिक हितों के साथ जोड़ कर देखने लगे हैं।

क्षेत्रीय आर्थिक समझौतों का एक नया दौर शुरू हो सकता है, जिसके साथ भारत को भी अपने हितों की रक्षा करनी होगी। क्षेत्रीय स्तर पर उभर रहे आर्थिक सहयोग समझौते के साथ भारत को नए सिरे से रिश्ते बनाने होंगे। तीसरी चुनौती हिंद-प्रशांत महासागर में भारत को अपने हितों की रक्षा करने की होगी। हिंद प्रशांत महासागर को लेकर वैश्विक स्तर पर तनाव और बढ़ सकता है और यह तनाव भारत के हितों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-जापान-अमेरिका-आस्ट्रेलिया के बीच बन रहे चार देशो के सहयोग संगठन के बीच सैन्य सहयोग के बारे में सूत्रों का कहना है कि अभी इस तरह की कोई अवधारणा नहीं है लेकिन भविष्य के बारे में कोई नहीं जानता। हिंद-महासागर के हालात सीधे तौर पर भारत के हितों को प्रभावित करते हैं इसलिए भारत को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।

अमेरिका और रूस-चीन के बीच सामंजस्य बनाने को लेकर भारतीय कूटनीति की एक अहम सोच यह कि शीर्ष स्तर पर वार्ता का सिलसिला जो जी-20 बैठक के साथ शुरु हुआ है वह आगे भी जारी रहे। जापान-अमेरिका-भारत (जय) के शीर्ष नेताओं के बीच सालाना संयुक्त बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव है लेकिन इसे अमली जामा अब अगली सरकार ही पहना पाएगी। इसी तरह से रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ भारतीय पीएम की सालाना बैठक की भी सोच है। इस बारे में उक्त देशों के साथ बातचीत जारी है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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