नई दिल्ली, अरविंद शर्मा। बिहार में जदयू से अलगाव के बाद अपनी राह तैयार करने में जुटी भाजपा को इसका अहसास तो है कि जातिगत समीकरण को छोड़ा नहीं जा सकता है लेकिन मंथन इस बात पर है कि ऐसे चेहरे की तलाश करनी होगी जो जातियों से परे जाकर भी जनता से संपर्क बना पाए। ऐसे में संभव है कि पार्टी किसी ऐसे चेहरे पर भी दांव लगाने का प्रयोग कर सकती है जो अब तक दूसरी तीसरी पंक्ति में शामिल रहे हों।

नीतीश के अतिरिक्त तेजस्वी यादव भी दें रहे बीजेपी को चुनौती

कोई भी फैसला पूरे प्रदेश से आने वाले फीडबैक के बाद ही लिया जाएगा। बिहार में सत्ता का समीकरण बदल जाने के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजद और जदयू की संयुक्त शक्ति से पार पाने की है।

आमतौर पर क्षेत्रीय दलों का मूल आधार जातीयों का गठबंधन होता है। भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश कुमार सात दलों की सरकार चला भी रहे हैं, जिसमें कांग्रेस को छोड़कर बाकी दलों की पहचान किसी न किसी जाति या समूह से जुड़ी है।

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ऐसे में भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश में जातीय समीकरण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा रहा। इतना जरूर देखा जा रहा कि प्रदेश की कमान जिसे दी जाए वह जनसंपर्क में भी दक्ष हो, क्योंकि उसके सामने लालू-नीतीश के अतिरिक्त तेजस्वी यादव की संवाद शैली भी बड़ी चुनौती बनकर आने वाली है।

प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े भी कर सकते है दौरा

महागठबंधन के उक्त तीनों बड़े नेता संवाद कला में पारंगत हैं। भाजपा के एजेंडे में बिहार का महत्व कितना बढ़ गया है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मात्र एक महीने के भीतर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का दूसरा दौरा होने जा रहा है। अभी 23-24 सितंबर को उन्होंने सीमांचल का दौरा किया था। अब 11 अक्टूबर को जेपी जयंती पर छपरा जिले के गांव सिताब दियारा जाने का कार्यक्रम है।

उन्होंने प्रदेश पदाधिकारियों को लोकसभा की कम से कम 35 सीटों पर जीतने का लक्ष्य दिया है। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, जिनमें से 22 पर एनडीए का कब्जा है। पिछले चुनाव में जदयू एवं लोजपा के साथ गठबंधन में लड़ते हुए भाजपा ने 39 सीटें जीती थीं। इस बार पुराने प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती है।

उससे पहले प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े भी संभवत: 5 अक्टूबर से बिहार के दौरे पर जाएंगे और छह छह जिलों का समूह बनाकर दौरा करेंगे। छह महीने की मांगी कार्ययोजना भाजपा ने बिहार के पार्टी पदाधिकारियों से अगले छह महीने की कार्ययोजना मांगी है कि नीतीश और तेजस्वी की जोड़ी से कैसे मुकाबले किया जाए। हालांकि नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश से इसका कोई संबंध नहीं है।

सिर्फ संकेत माना जा सकता है कि शीर्ष नेतृत्व मिशन-35 में अपने स्तर से कोई कसर नहीं रहने देना चाहता। माना जा रहा है कि इसी कार्ययोजना के अनुसार दिल्ली की ओर से भी प्रदेश भाजपा के नए नेतृत्व को एक रोडमैप दिया जा सकता है।

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Edited By: Shashank Mishra

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