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भारत के ये 8 अनोखे गांव

prabhapunj.mishra   |  Publish Date:Fri, 04 Aug 2017 04:41 PM (IST)
रघुराजपुर
रघुराजपुर

2000 में उड़ीसा के इस गांव को राज्‍य के पहले हैरिटेज गांव का तमगा मिला था। ये गांव पट्टचित्र कला के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग ट्राइबल पेंटिंग, पेपर मेच टॉय, वुडन टॉय बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं। इस गांव का हर शख्‍स कलाकार है। ये गांव पुरी से कुछ दूरी पर स्थित है। आप यहां कभी भी घूमने आ सकते हैं।

तिलौनिया
तिलौनिया

इस गांव का हर शख्‍स सोलर इंजीनियर है। गांव के हर घर की छत पर आप को सोलर पैनल चमकते हुए नजर आएंगे। यहां गांव वालों को पढ़ाने का काम संजीत रॉय ने किया। यहां गांव में घूघंट में बहुओं को, लोहार, किशान भी एक सोलर इंजीनियर है। ये सभी सोलर पैनल को इंस्‍टाल करना और रिपेयर करना जानते हैं। ये गांव अजमेर में स्थित है।

मट्टूर
मट्टूर

ये गांव हजारों साल पुरानी हमारी संस्‍कृति और सभ्‍यता को जिंदा रखे हुए है। इस गांव का हर शख्‍स संस्‍कृत भाषा में बात करता है। फिर चाहे वो बच्‍चा हो या बड़ा। यहां के लोग वैदिक जिंदगी जीते हैं। इस गांव को संस्‍कृत गांव भी कहा जाता है। यहां की पाठशाला में बच्‍चे पांच साल में भाषा का अध्‍यन करते हैं। ये गांव बैंगलुरु से 300 किलोमीटर दूर है।

कथेवाड़ी
कथेवाड़ी

इस गांव को आर्ट ऑफ लिविंग के संस्‍थापक श्री श्री रव‍िशंकर ने गोद ले रखा है। ये गांव महाराष्‍ट्र के नांदेड़ जिले में पड़ता है। इस गांव को संस्‍था ने मॉडल विलेज में बदल दिया गया है। इस गांव के लोग एल्‍कोहल पर निर्भर थे। अब इस गांव के लोग एल्‍कोहल नहीं लेते हैं। ये गांव नांदेड़ रेलवे स्‍टेशन से 90 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। यहां आप किसी भी मौसम में जा सकते हैं।

रालेगढ़ सिंध
रालेगढ़ सिंध

इस गांव का नाम सुनकर आप के दिमाग में जो छवि बनती है वो है एक सफेद धोती कुर्ता पहने सिर पर नेहरू टोपी लगाए एक बुजुर्ग व्‍यक्ति की जिसने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन कर के देश को एकजुट कर दिया। ये नाम है अन्‍ना हजारे का। गांव को अन्‍ना हजारे की मेहनत ने पदल कर रख दिया है। यहां पानी की समस्‍या भी नहीं है। ये गांव मुंबई से 100 किलोमीटर दूर है।

पनामिक
पनामिक

पनामिक गांव सियाचिन ग्‍लैशियर के पास स्थित है। इस गांव के पास गर्म पानी की धारा बहती है। दूर-दूर से लोग इस गांव में बहती गर्म पानी की धारा में डुबकी लगाने के लिए आते हैं। ये गांव समुद्र तल से दस हजार फीट की ऊंचाई से भी ऊपर बसा हुआ है। लेह की नुब्रा वैली से ये गांव 150 किलोमीटर दूर है। इस गांव में जाने का सबसे अच्‍छा समय जून से सितंबर के बीच है।

वेलास
वेलास

मुंबई से 230 किलोमीटर दूर रत्‍नागिरी जिले में बना वेलास गांव अपने आप में अनोखा है। ये गांव समुद्र किनारे बसा हुआ है। फरवरी से अप्रैल के महीने में इस गांव में कछुओं को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं। इस गांव को एक एनजीओ ने गोद ले रखा है। जो गांव में आने वाले कछुओं का ध्‍यान रखता है। फरवरी से मार्च के बीच इस गांव में समुद्र का स्‍तार बढ़ा होता है। जब यहां पर कछुआ उत्‍सव मनाया जाता है।

लांबासिंगी
लांबासिंगी

इस गांव में कुछ साल पहले भारी बर्फबारी हुई थी। जिसके बाद आंध्र प्रदेश का लांबासिंगी गांव सुर्खियों में आ गया। इस गांव को दक्षिण भारत का कश्‍मीर भी कहा जाता है। इस गांव में लोग सर्दियों के मौसम में ही घूमने आते हैं। मौसम की वजह इस गांव का वातावरण बहुत ही अनोखा हो जाता है। अगर आप यहां आएं तो हो सकता है यहां फिर से बर्फ गिरे। ये गांव विशखापट्टनम एयरपोर्ट से पास में है। यहां आप दिसंबर से फरवरी के बीच में जा सकते हैं।

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