यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 27, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
ओडिसी को समर्पित किया जीवन
ई पीढ़ी को ओडिसी नृत्य का प्रशिक्षण देने वाली ज्योति श्रीवास्तव कहती हैं कि कला की खोज और उसके प्रति ...और पढ़ें

इंसान का जीवन लय-ताल और संगीत का ही एक स्वरूप है, इस कला को अपने में आत्मसात कर आगे बढ़ना कोई आसान नहीं है। इसके लिए जरूरत होती है पूर्ण समर्पण की। वैसे कुछ लोग कला के प्रति सिर्फ संपूर्ण रूप से समर्पित ही नहीं होते बल्कि उसे अपने जीवन का मकसद बना लेते हैं। ऐसा ही जज्बा 51 वर्षीय ज्योति श्रीवास्तव के अंदर है। ओडिसी नृत्य के माध्यम से दूसरों का कल्याण करने में लगे कला के ये उपासक इसके लिए कुछ भी सहने को तैयार रहते हैं। नोएडा के सेक्टर-56 में उन्होंने वैशाली कला केंद्र से नई पीढ़ी को कला से अनुशासित करने का लक्ष्य बनाया है।
नन्हीं उम्र में जली नृत्य की लौ
ज्योति बताती हैं कि शायद ये उन्हें गॉड गिफ्ट ही था कि महज ढाई वर्ष की उम्र में उन्हें नृत्य के प्रति लगन लग गई। मां ममता ने इसे पहचाना और चार साल की उम्र में ही उन्हें नृत्य प्रशिक्षण के लिए गुरु श्रीनाथ राऊत के पास ले गई। चार से 14 वर्ष तक भरतनाट्यम, मोहिनी अंट्टम, कथक और ओडिसी नृत्य सीखती रहीं। घर के पास ही स्थित गंधर्व महाविद्यालय में भी उन्होंने प्रशिक्षण लिया।
मन रमा ओडिसी में
वह बताती हैं कि 14 वर्ष के बाद उन्होंने सिर्फ ओडिसी नृत्य सीखने का निर्णय किया। इसके बाद से इस नृत्य की प्रत्येक शैली को उन्होंने दिल से सीखा। वह कहती हैं कि कला की खोज और उसके प्रति प्यार कभी खत्म नहीं होती, इसलिए अभी भी वह गुरु दुर्गाचरण रणवीर से आज भी प्रशिक्षण ले रही हैं। उन्होंने सूर्य अष्टका, अष्टनायिका, दशामहाविद्या जैसी शैलियों में महारत हासिल की। उन्हें ओडिसी की देवो प्रसाद शैली भाती है। ये पूरी तरह से आध्यात्म और ईश्वर में डूबी शैली है। इस पांडव प्रधान शैली को समझना भी आसान है। इसके साथ ही उन्होंने चंदा और चामपु ओडिसी संगीत पर भी नए प्रयोग किए हैं।
35 वर्ष के नृत्य के करियर में उन्होंने हॉलैंड, बेल्जियम, अरमेनिया, रशिया, लग्जमबर्ग, साउथ कोरिया, श्रीलंका, ओमान और बहरीन में भी भारतीय नृत्य की प्रस्तुतियां दी। साउथ कोरिया में उन्होंने कोरियन आर्ट सेंटर में भी काम किया। ओडिसी में में विषारद प्राप्त ज्योति को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संस्कृति विभाग से जूनियर फैलोशिप और छात्रवृलि भी मिल रही है।
परिवार का सहयोग
वह बताती हैं कि जिस तरह उन्हें कभी परिवार ने ये अहसास ही नहीं होने दिया कि वह एक लड़की हैं, इस तरह का माहौल देश की हर बहन-बेटी को मिले यही उनकी इच्छा। उनका कहना है कि विवाह से पहले माता-पिता और विवाह के बाद पति राहुल का सहयोग उन्हें लक्ष्य के प्रति आगे बढ़ाता रहा।
नई पीढ़ी सीखे अनुशासन
वह बताती हैं कि शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा उन्होंने गुरुजी से पाई ये उनके लिए अमूल्य है। वह इस धरोहर को नई पीढ़ी के साथ साझा कर रही हैं। देश की युवाओं को यह समझना जरूरी है कि हमारा देश अमूल्य कलाओं की धरा है। आज समाज में ओछापन बढ़ गया है। युवा पीढ़ी शॉपिंग मॉल्स, फैशन और फास्ट फूड को जिंदगी मानने लगी है। ऐसे में उन्हें नृत्य के माध्यम से अनुशासन और जीवन का फलसफा समझाना जरूरी हो गया है। वैशाली कला केंद्र में उनसे ओडिसी का प्रशिक्षण लेने पांच वर्ष से लेकर 38 वर्ष तक के शिष्य आते हैं। अभी उनके पास 40 शिष्य हैं, इन्हें नृत्य के माध्यम से जीवन जीने की कला सीखाना ही उनका लक्ष्य है। उन्हें इस वर्ष केरला और ओडिशा में प्रस्तुति देने का भी अवसर मिला।
सम्मान
- श्रीनगर मणि अवार्ड 1992 च सनातन नृत्य पुरस्कार 1994
- गुरु सिंहारी श्यामसुंदर अवार्ड 1995 च इंटरनेशनल वुमन्स डे अवार्ड 2003
- नवरत्न अवार्ड 2004
- इंदिराणी रहमान अवार्ड 2005
- एकता अवार्ड 2006
- रोटरी अवार्ड 2007
- लायंस इंटरनेशनल अवार्ड 2007
- नेशनल केयर का वुमन ऑफ दि ईयर अवार्ड 2008
- राजीव गांधी एकता सम्मान 2009 - सुरभि अवार्ड 2011
- माहारी अवार्ड 2013
रचना वर्मा
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