हर काम की शुरुआत या पहल अपने से ही की जाती है। जब घर में सफलता मिलती है तो बाहर भी आपको लोगों का प्यार व समर्थन मिलता है। यह कहना है निझावन समूह की डायरेक्टर व शिक्षाविद् ललिता निझावन का। ललिता को केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से 100 शीर्ष भारतीय महिला अचीवर्स-201- में चुना गया है। उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए यह पुरस्कार दिया गया है।

आज परिवारों का आकार सिकुड़ता जा रहा है। छोटी-छोटी तकरार या अन्य कारणों से परिवार टूट रहे हैं, ऐसे दौर में भी संयुक्त परिवार में सबके साथ सामंजस्य बनाकर ले चलना निझावन की बड़ी उपलब्धि है। ललिता पति श्याम निझावन व बेटे अंकुश, अर्जुन निझावन सहित 11 सदस्यों के संयुक्त परिवार के साथ वसंत विहार में रहती हैं। वह कहती हैं कि 'इसी परिवार की तरह हमारे सैकड़ों स्कूलों में पढऩे वाले हजारों बच्चे भी परिवार की तरह हैं। यह प्रेरणा भी माता-पिता, पति व बेटों से ही मिली।'

ऐसे हुआ चयन

ललिता का चयन शिक्षा वर्ग में किया गया है। मंत्रालय ने देश भर से प्राप्त हजारों महिला अचीवर्स के ट्रैक रिकॉर्ड देखे। इसके बाद कुल 179 महिलाओं की सूची मंत्रालय की वेबसाइट के जरिये पब्लिक डोमेन में भेजी गई। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली देश भर से 27 महिलाएं सूची में थी। तीन स्तरीय ऑनलाइन सार्वजनिक मतदान के जरिये शिक्षा के क्षेत्र में ललिता का चयन किया गया।

बकरी चरने जाएं तो बच्चे पढ़ें

वर्ष 1992 में ललिता को उनके एक मित्र ने बताया कि राजस्थान के बांसवाड़ा क्षेत्र के आदिवासी बहुल इलाके में बहुत से ऐसे परिवार हैं जहां बच्चों को तीसरे-चौथे दिन भोजन मयस्सर होता है। ललिता ने बांसवाड़ा जाकर बच्चों के हालात देखे तो बहुत ही दयनीय स्थिति थी। पहले आर्थिक सहयोग पर विचार किया लेकिन फिर तय किया कि दो वक्त की रोटी से ज्यादा जरूरी इस समस्या का स्थाई समाधान महत्व रखता है। और वह उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़कर ही खोजा जा सकता है। इसके लिए शिक्षा से बेहतर और कोई जरिया नहीं था और न आज भी है। बच्चों को खुद पढ़ाने की इच्छा जताई, वहां के परिवार तैयार हुए। आठ-दस बच्चों के साथ शुरुआत हुई। लेकिन समस्या एक छत की भी थी आखिर कहां बैठकर पढ़ाई हो? फिर वहीं एक व्यक्ति की झोपड़ी में स्कूल शुरू हुआ। उस झोपड़ी में रात को उसकी बकरियां रहती थीं। दिन में बकरियां चरने जाती थीं तो उस वक्त बच्चे पढ़ाई करते थे। धीरे-धीरे बच्चों का रुझान बढऩे लगा आज बांसवाड़ा में 34- स्कूल हैं जिनमें 42 हजार से अधिक बच्चे पढ़ते हैं।

बंदूक पर भारी पड़ी कलम

ललिता ने बताया कि उनके स्कूलों में पूर्वोत्तर राज्यों की भी कई छात्राएं पढऩे आती थीं। बच्चों ने बताया कि असम में उनके गांवों में बहुत से बच्चे उल्फा उग्रवादियों के डर के कारण स्कूल नहीं जा पाते। ललिता ने वहां जाने का फैसला किया तो परिवार के सभी लोगों ने उन्हें मना किया। जिद करके ललिता त्रिपुरा गईं। वहां भी उन्होंने परिवारों को समझाया। बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। आज पूर्वोत्तर राज्यों के मणिपुर, त्रिपुरा समेत कई राज्यों में उनके 345 स्कूल हैं जहां 12 हजार से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। इन स्कूलों के पढ़े हुए सैकड़ों बच्चे आज शिक्षक, डॉक्टर, अधिवक्ता समेत कई प्रोफेशन में हैं। ललिता के स्कूल से ही पढ़े हुए बच्चे आगे चलकर शिक्षक बन जाते हैं। वे वहीं पर बस्ती के नाम से ही स्कूल खोल देते हैं जिससे स्कूलों की संख्या बढ़ती गई। प्रबंधन करती हैं बाकी काम सीनियर छात्र खुद ही संभालते हैं। बच्चों से बस नाम मात्र फीस ली जाती है। निझावन समूह के कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी (सीएसआर) के अंतर्गत सीकेआरडीटी फाउंडेशन बनाया गया है।

उपलब्धियों का आसमां

-एमिटी विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष-2009 में महिला उद्यमशीलता के लिए एमिटी उत्कृष्टता पुरस्कार।

-भोपाल में वर्ष-2008 में उद्यमशीलता के लिए ओजस्विनी पुरस्कार।

-वर्ष-2005 में भारत निर्माण की ओर से दिल्ली की शीर्ष सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाशाली महिला का पुरस्कार।

-शिक्षा मंत्री प्रोफेसर नरूल हसन द्वारा 1974 में सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी पुरस्कार।

-उपराष्ट्रपति डॉ.जाकिर हुसैन द्वारा कला उद्यमशीलता का पुरस्कार। इसके अलावा ललिता को विभिन्न क्षेत्रों में दो दर्जन से अधिक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

प्रस्तुति: अरविंद कुमार द्विवेदी,

दक्षिणी दिल्ली

Posted By: Babita kashyap