अविनाश दास निर्देशित ‘अनारकली ऑफ आरा’ में आरा की अनारकली की भूमिका स्वरा भास्कर ने निभाई है। अनारकली देसी गायिका है। वह मंच पर गाती है और अपनी अदाओं से दर्शकों को रिझाती है। इस फिल्म का संगीत तैयार किया है रोहित शर्मा ने। उनसे एक मुलाकात:
-‘अनारकली ऑफ आरा’ के पहले आपकी कौन सी फिल्में आई हैं?
आनंद गांधी की ‘शिप ऑफ थिसियस’ में मेरा ट्रैक था। विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जैम’ का संगीत मैंने ही तैयार किया था। फिर बच्चों की फिल्म ‘शॉर्टकट सफारी’ में संगीत दिया। अभी ‘अनारकली ऑफ आरा’ आ रही है।
-फिल्म संगीत की तरफ कैसे रुझान हुआ?
संगीत के प्रति रुझान बचपन से था। हालांकि कभी सोचा नहीं था कि फिल्मों में संगीत निर्देशन करूंगा। घर के दबाव में दिल्ली से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर भी संगीत में रुचि बनी रही। मैंने संगीत की विधिवत शिक्षा ली। मैंने शास्त्रीय संगीत का अभ्यास किया। उस दरम्यान ऐसा लगा कि फिल्मों के लिए कुछ किया जाए और मैं मुंबई आ गया।
-पहली फिल्म कौन सी थी?
पहली फिल्म थी ‘फोसला’ (फ्रस्ट्रेटेड वनसाइडेड लवर्स एसोसिएशन)। उसी समय दिव्येन्दु शर्मा, राजकुमार राव और स्वरा भास्कर से पहली बार मुलाकात हुई थी। यह उन सभी की पहली फिल्म थी। अफसोस कि वह फिल्म नहीं बन सकी।
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-‘अनारकली ऑफ आरा’ के संगीत में क्या खास होगा?
इस फिल्म का संगीत मिट्टी से जुड़ा हुआ है। बिहार की सुगंध है। वहीं की लोकधुन, आज के फिल्म संगीत की झलक और कुछ समकालीन ट्रैक हैं। कुल ग्यारह गाने हैं। हमने अच्छा मिश्रण किया है। निर्देशक अविनाश ने स्वयं एक पारंपरिक गीत लिखा। उनके साथ रामकुमार सिंह, रवींद्र रंधावा, डॉ. सागर और प्रशांत इंगोले के गीत हैं।
-फिल्म की नायिका देसी गायिका है, जो परफॉर्म भी करती है। उसके गीतों में कैसी सावधानी बरतनी पड़ी कि वे द्विअर्थी तो हो, लेकिन...
मैं इस फिल्म के गीतों का बहुअर्थी कहूंगा। पहला अर्थ बहुत साफ-सुथरा है। दूसरातीसरा अर्थ श्रोता और दर्शक पर निर्भर करता है। कुछ के राजनीतिक अर्थ भी हैं। द्विअर्थी गीत कलाकार की मुद्राओं से अश्लील संकेत देते हैं। ‘अनारकली ऑफ आरा’ में ऐसा नहीं है।
-देसी आवाज के लिए किन गायकों को बुलाया आपने?
स्वाति शर्मा, पावनी पांडे, रेखा भारद्वाज और सोनू निगम ने गीत गाए हैं। स्वाति शर्मा को ‘बन्नो तेरा स्वैगर’ और पावनी पांडे को ‘लैला’ की वजह से लोग जानते हैं।
-पुरबिया लोकधुनों को फिल्मों में आज अपमार्केट नहीं माना जाता। ऐसा क्यों?
मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ है। अभी ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ में ‘तीसरी कसम’ के ‘पिंजरे वाली मुनिया’ का फिर से इस्तेमाल हुआ है। मेरे ख्याल से यह चौथी बार हो रहा है। पुरबिया लोकधुनों का खूब इस्तेमाल होता रहा है। ‘अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्में आएंगी तो देसी धुनें भी लोकप्रिय होंगी।
प्रस्तुति- अजय ब्रह्मात्मज

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Posted By: Srishti Verma