भारतीय महिलाएं प्राकृतिक प्रसव के लिए तैयार नहीं होतीं। डरी होती हैं लेबर को लेकर। वे एंजॉय करना चाहती हैं अपनी प्रेग्नेंसी, लेकिन हर वक्त तनाव में रहती हैं। ऐसे में चाइल्ड बर्थ एजुकेटर अनिका पुरी उन्हें हर जानकारी देकर एम्पॉवर करती हैं और तैयार करती हैं नेचुरल बर्थ के लिए..

अनिका पुरी जब लंदन में थीं तो पहली प्रेग्नेंसी के दौरान उनके पास परिवार का कोई सदस्य नहीं था। हर थेरैपी के लिए अकेले ही अलग-अलग जगहों पर जाना होता था। ऐसे में उन्हें महसूस हुआ कि गर्भवती महिलाओं को अपनी हर परेशानी का हल एक ही छत के नीचे मिलना चाहिए। तब उन्होंने मीडिया मार्केटिंग की अपनी जॉब छोड़ चाइल्ड बर्थ एजुकेटर का कोर्स किया और इसका लाभ अपने देश में देने के लिए भारत लौट आई। अपने इस सफर को कुछ इस तरह से शेयर किया उन्होंने..

भारत में कैसे आई?

अपने दोस्तों से यहां बात करती थी तो यही लगता था कि भारतीय महिलाओं को अपने शरीर पर भरोसा नहीं है। उन्हें लगता है कि वे नेचुरल बर्थ नहीं कर पाएंगी। इसे लेकर वे डरी रहती हैं। उन्हें प्रसव का दर्द नहीं चाहिए। वे नहीं जानतीं कि माइंड-बॉडी कनेक्शन इतना बड़ा है कि नेचुरल बर्थ मुश्किल काम नहीं है। मैं अपने देश की महिलाओं को यही बात समझाना चाहती थी, इसीलिए भारत आई।

कैसे शुरू किया यह काम?

पैसे थे नहीं और मेरा कॉन्सेप्ट भी नया था। इसे समझाने में बहुत दिक्कत आती थी। कोई दस पंद्रह जगह अपने प्रपोजल भेजे, तो एक कॉरपोरेट ने अपने रीटेल स्टोर्स में इसे अपनाने का मन बनाया। 'मॉम एंड मी' मेरा ही विचार हैं। यहां बजने वाला संगीत और फैल रही खुशबू गर्भवती महिला की पसंद से तय की। सेल्स के लागों को भी गर्भवती के तनावों की ट्रेनिंग दी, ताकि वे उसी हिसाब से व्यवहार करें।

तो क्या ख्वाब पूरा हुआ?

नहीं, मैं चाहती थी कि भारत की सारी गर्भवती महिलाएं अपनी पॉवर को समझें। मैं उन्हें अपनी सेवाएं देना चाहती थी, लेकिन स्टोर में वे रिलैक्स नहीं हो पाती थीं। अलग मूड होता था उनका। मुझे लगा कि किसी अस्पताल में रहूंगी तो ज्यादा अच्छा कर पाऊंगी। फोर्टिस ने हमें जगह दी। 'मामामियां कॉन्सेप्ट' के साथ अब मैं एक छत के नीचे भावी मां की हर परेशानी हल कर रही हूं।

प्रेग्नेंसी की कठिनाइयों को कैसे दूर करती हैं आप?

कई थेरैपीज का प्रयोग करते हैं हम। इनमें रेकी, रिफ्लेक्सोलॉजी, अरोमा, एक्यूप्रेशर मुख्य हैं। प्रसव से पहले फिटनेस और प्रसव के बाद संतुलित शरीर बनाये रखने के लिए योग और एरोबिक्स की मदद लेते हैं। अरोमा थेरैपी काफी प्रभाव डालती है। इसके द्वारा हम हारमोंस को बैलेंस कर लेते हैं। हम पिट्यूटरी ग्लैंड को सक्रिय कर देते हैं और एड्रीनल को निष्क्रिय ताकि गर्भवती महिला को आराम मिल जाए। अगर पेशेंट को लेबर सपोर्ट चाहिए तो हम प्रसव के समय भी साथ होते हैं।

और कौन-सी विशेषताएं हैं?

हमारे पास विशेष टेबल हैं, जिन पर हम उन्हें आराम देकर उनकी मसाज कर सकते हैं। वेट मैनेजमेंट और लेबर के लिए बॉडी को तैयार करने के लिए हम एक महीने में 12 क्लासेस देते हैं। भावी पिता को भी एजुकेट करते हैं। पत्नी की मनोदशा से अवगत कराते हैं। सपोर्ट करने के लिए प्रेरित करते हैं। गर्भ के बाद हम स्तनपान के लिए मां को शिक्षित करते हैं। उन्हें सही तरीका बताते हैं। होलिस्टिक ट्रीटमेंट करते हैं। जो महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद मां नहीं बन पा रही हैं, उनकी मानसिकता को समझकर मदद करते हैं। हमारी टीम में सभी महिलाएं हैं जो युवा हैं, दोस्त की तरह हैं। परेशान गर्भवती महिला को गले लगाने में हमें कोई परहेज नहीं। उनकी पसंद का संगीत, उनकी इच्छा के अनुरूप खुशबू, छोटी सी बुक और डीवीडी लाइब्रेरी है यहां, अस्पताल जैसा डरावना माहौल नहीं।

आपके दो बच्चे हैं, काम के साथ कैसे मैनेज किया परिवार को?

जब मेरा बेटा निर्वाण चार साल का था तो घर से ही काम करती थी। मैं जाती थी तो पति घर पर रहते। बेटी इनायत तीन साल की हुई तो मैंने फुल टाइम जॉएन किया। जब कॉरपोरेट में थी तो हेडऑफिस बेंगलुरु में था। तीन दिन बेंगलुरु और चार दिन दिल्ली में रहती थी। दिल्ली में घर से काम करती थी। पति ने सहयोग किया तो ये समय निकल पाया। अब तो बच्चे समझदार हो गए हैं, पर मैं ही उन्हें स्कूल के लिए तैयार करती हूं। उनका होमवर्क कराती हूं। उनके साथ बुक्स पढ़ती हूं। मैं सोचती हूं कि बच्चों को क्वालिटी टाइम देना जरूरी है। हां, दोस्तों और पार्टियों के लिए समय नहीं निकाल पाती। इसका मुझे गिला भी नहीं है।

अगर कोई आपके पास नहीं आ सकता तो जानकारी कैसे हासिल करे?

हमारी वेबसाइट है। यू-ट्यूब पर वीडियो के जरिये डॉक्टर्स और हमने जानकारी दी है। ईमेल और फोन पर भी हम उपलब्ध हैं। वैसे हर गर्भवती महिला की जरूरतें अलग-अलग होती हैं, लेकिन वे खुद को अकेला महसूस न करें। अपने बदलते हारमोंस के बारे में समझें। लेबर का डर न पालें। खुद को मानसिक रूप से सशक्त महसूस करें।

यशा माथुर

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