सड़क हादसे ने छीना पैर, बुलंद हौसले से रच रहे स्वर्णिम इतिहास; सुमित अंतिल की कहानी कर देगी भावुक
सुमित अंतिल ने पैरा एशियाई खेलों में लगातार दूसरा गोल्ड जीता है। सड़क हादसे में पैर गंवाने वाले सुमित कई सालों से जैवलिन में देश का मान बढ़ा रहे हैं।
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सुमित अंतिल

समय कम है?
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जागरण, सोनीपत। जापान के आइची-नागोया में खेले जा रहे पैरा एशियाई खेलों में एक बार फिर हरियाणा का दम सब पर भारी पड़ा। सोनीपत के गांव खेवड़ा के पैरा खिलाड़ी सुमित आंतिल ने इतिहास रचते हुए गोल्डन भाला फेंका है।
सुमित ने 72.46 मीटर की दूरी तय करते हुए स्वर्ण पदक जीत पैरा एशियाई खेलों में एक बार फिर देश का नाम रोशन किया है। जैवलिन थ्रो में सुमित के स्वर्ण पदक जीतते ही उसके गांव खेवड़ा समेत देशभर में जश्न का माहौल शुरू हो गया।
लगातार दूसरी बार भारत को दिलाया गोल्ड
पैरा एशियाई खेलों में लगातार दूसरी बार देश का गोल्ड मेडल दिलाने वाले सुमित आंतिल का सफर कठिनाइयों भरा रहा है। सड़क हादसे में एक पैर गंवाने के बाद भी सुमित ने जिंदगी से कभी हार नहीं मानी और बुलंद हौसले से हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया।
चेहरे पर मुस्कान रखने वाले सुमित ने न सिर्फ अपने से बड़ी तीन बहनों रेनू, सुशीला व किरण को हौसला दिया बल्कि इकलौते बेटे के साथ हुए हादसे से दुखी मां निर्मला देवी को कहा कि- मां रो मत, जो दो पैर वाला नहीं दे पाएगा, तुझे इतना सुख दूंगा।
पैरालंपिक में भी दो स्वर्ण जीत चुके हैं सुमित
सुमित आंतिल ने अपनी कही बात को सच कर दिखाया और कड़ी मेहनत से पैरा खेलों में स्वर्णिम इतिहास रच दिया। सुमित ने दो बार पैरालिंपिक में देश का स्वर्ण पदक दिलाया है।
सुमित ने इससे पहले 2023 के एशियाई पैरा खेलों में 73.29 मीटर के विश्व रिकार्ड के साथ स्वर्ण जीता था, जबकि इस साल मई में उन्होंने 74.82 मीटर का नया विश्व रिकार्ड बनाया था। खास बात यह है कि टोक्यो और पेरिस पैरालिंपिक चैंपियन होने के साथ विश्व रिकार्ड भी सुमित के नाम हैं।
हादसे से बदल गई जिंदगी
सुमित आंतिल का जन्म 7 जून 1998 को हुआ था। सुमित जब सात साल था, तब एयरफोर्स में तैनात पिता रामकुमार की बीमारी से मौत हो गई। पिता का साया उठने के बाद मां निर्मला ने चारों बच्चों का पालन-पोषण किया।
निर्मला देवी ने बताया कि सुमित जब 12वीं कक्षा में था, कामर्स का ट्यूशन लेता था। 5 जनवरी 2015 की शाम को वह ट्यूशन लेकर बाइक से वापस आ रहा था, तभी सीमेंट के कट्टों से भरी ट्रेक्टर-ट्राली ने सुमित को टक्कर मार दी और काफी दूर तक घसीटते हुए ले गई। इस हादसे में सुमित को अपना एक पैर गंवाना पड़ा था। सुमित को वर्ष 2016 में पूना से कृत्रिम पैर लगवाया।
कोच की प्रेरणा से खेलों में बढ़े आगे
हादसे के बावजूद सुमित कभी उदास नहीं हुआ। रिश्तेदारों व दोस्तों की प्रेरणा से सुमित ने खेलों की तरफ ध्यान दिया और साईं सेंटर पहुंचा। पहले उन्होंने कुश्ती में हाथ आजमाएं, फिर एशियन रजत पदक विजेता कोच विरेंद्र धनखड़ ने सुमित का मार्गदर्शन किया और उसे लेकर दिल्ली पहुंचे।
जहां द्रोणाचार्य अवार्डी कोच नवल सिंह से जैवलिन थ्रो के गुर सीखे। सुमित ने वर्ष 2018 में एशियन चैंपियनशिप में भाग लिया, लेकिन 5वीं रैंक ही प्राप्त कर सके। वर्ष 2019 में वर्ल्ड चैंपियनशिप में रजत पदक जीता, उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
