नई दिल्ली, योगेश शर्मा। चार ऑपरेशन हुए, बाएं पैर में रॉड पड़ी और डॉक्टर ने खेल छोड़ने की सलाह दे डाली। लेकिन, यह गौरव शर्मा का हौसला था जिसने तमाम रुकावटों के बावजूद उन्हें हिम्मत नहीं हारने दी। 

उन्होंने न सिर्फ भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने का सपना संजोया, बल्कि उसे पूरा करने में भी सफल रहे। गौरव ने वेटलिफ्टिंग में दिल्ली के लिए दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीता, लेकिन कोच के भेदभाव के कारण उन्होंने 2006 में पावरलिफ्टिंग का रुख कर लिया। 

एक साल बाद ही उन्होंने न्यूजीलैंड में हुई राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में और 2010 में हांगकांग में हुई एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण जीता। उन्हें सबसे बड़ी सफलता 2016 में लंदन में मिली, जब उन्होंने पावरलिफ्टिंग की विश्व चैंपियनशिप में 125 किग्रा वर्ग में स्वर्ण जीतकर अपना सपना पूरा किया।

गौरव कहते हैं, 'मैंने सब-जूनियर में वेटलिफ्टिंग में दिल्ली के लिए पदक जीते। इसके बाद कोचों ने मेरे साथ भेदभाव किया और मेरे साथ सीनियर खिलाड़ियों को खिला दिया। हालांकि, इस दौरान जूनियर स्तर पर ही एक दुर्घटना में मेरे बायें पैर में फ्रैक्चर हो गया और मेरे पैर में रॉड डालनी पड़ी। इसके बाद मेरे लिए इस खेल में वापसी करना मुश्किल हो गया। डॉक्टरों ने मुझे खेल छोड़ने की सलाह दी। यहां तक कि मैंने दो साल बिस्तर पर ही बिताए, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। इस दौरान मैं आर्थिक तंगी से घिर गया और मैंने वेटलिफ्टिंग छोड़ दी। इसके बाद एक कंपनी ने मेरा खर्चा उठाने को तैयार हो गई, लेकिन कोचों के रवैये की वजह से मैंने वेटलिफ्टिंग की जगह पावरलिफ्टिंग को अपना लिया। इसके बाद मेरी दुनिया ही बदल गई।'

गौरव अब तक कुल 25 पदक जीत चुके हैं, जिसमें वेटलिफ्टिंग में पांच और पावरलिफ्टिंग में 20 पदक उनके नाम हैं। उन्होंने राष्ट्रीय पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप 2006 व 2007 में एक स्वर्ण और एक रजत भी जीता। वेटलिफ्टिंग के ज्यादा डोपिंग मामले सामने आने की वजह से गौरव का मानना है कि भारत में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी डोप टेस्ट होने चाहिए, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि धूमिल न हो।

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Posted By: Bharat Singh