नई दिल्ली, योगेश शर्मा। दुति चंद का बुरा समय 2014 में शुरू हुआ जब भारतीय एथलेटिक संघ ने दुति को लिंग परीक्षण के लिए बुलाया और बाद में उन पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन, खेल पंचाट की दखल के बाद उनका प्रतिबंध 2015 में हटा दिया गया। जकार्ता एशियन गेम्स में दो रजत जीतकर उन्होंने अपने को फिर साबित किया। यहां कलिंगा औद्योगिक प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में पहुंची ओडिशा की दुति चंद से खास बातचीत की। पेश है मुख्य अंश :

आप इस खेल में कैसे आईं? 

मेरे पिता बुनकर थे और रोजना 10 रुपये ही कमाते थे। मैंने चार साल की उम्र में दौड़ना शुरू कर दिया था। जब मैं गांव में दौड़ा करती थी तो मेरी दीदी सरस्वती ने मुझसे कहा कि तू दौड़ना जारी रख, एक दिन पदक भी जीत लेगी। फिर मैंने एक रेस में हिस्सा लिया और मैं विजयी रही थी। इसके बाद चाहे जो भी हालात रहें हों, मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

2014 में एआइएफएफ के कारण आपका करियर लगभग खत्म होने की कगार पर था। आपने कैसे वापसी की?

सभी को पता है कि मैंने कितना झेला और मेरे साथ कितना गलत हुआ। खेल पंचाट में केस चल रहा था जिसके कारण मैं अपने खेल पर ध्यान नहीं दे पाई थी। फिर 2014 में ही मुझे राष्ट्रीय कैंप से निकाल दिया गया, जिससे मैं ट्रेनिंग नहीं कर पा रही थी। इस दौरान बैडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद ने मेरी मदद की। उन्होंने मुझे अपनी अकादमी में बुलाया और मैंने वहां अभ्यास किया। मैं अब आगे बढ़ चुकी हूं और पदक भी जीत गई हूं।

एशियन गेम्स में दो रजत जीते और दोनों स्पर्धा में अपने पीटी ऊषा के समय को पीछे छोड़ा? 

ऊषा दीदी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ना सम्मान की बात है। रेस खत्म होने के बाद मुझे पता चला कि मैंने उनके रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। 

आप स्वर्ण से चूक गईं क्योंकि आपकी प्रतिद्वंद्वी की हाइट आप पर हावी पड़ गई?

मैंने 100 मीटर हीट में भी अच्छा किया और फाइनल में भी अच्छा किया। लेकिन स्वर्ण नहीं जीत पाई। बस एक माइक्रो सेकेंड से स्वर्ण चला गया। उसकी हाइट अच्छी थी लेकिन हाइट का दबाव तो हमेशा रहेगा। मैं हाइट पर ज्यादा ध्यान नहीं देती, सिर्फ ट्रेनिंग पर देती हूं।

टोक्यो ओलंपिक की तैयारी के लिए आपके पास समय व मदद दोनों है, किस तरह से तैयारी करेंगी?

मेरा काम सिर्फ ट्रेनिंग करना है। मुझे जिस चीज की जरूरत होगी मैं राज्य सरकार से मांगूगी लेकिन सभी की मदद रहेगी तो पदक भी आएगा। 

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