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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 06, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

CWG 2022: दिव्या काकरान ने कामनवेल्थ गेम्स में पदक जीतकर अपने पिता से किया वादा निभाया

By Sanjay SavernEdited By:
Published: Sat, 06 Aug 2022 07:15 AM (IST)

CWG 2022 बर्मिंघम जाने से पहले दिव्या ने पिता से वादा किया था कि मेडल जीतकर ही लौटूंगी। शुक्रवार रात ...और पढ़ें

भारतीय महिला पहलवान दिव्या काकरान (एपी फोटो)
भारतीय महिला पहलवान दिव्या काकरान (एपी फोटो)

नई दिल्ली, आनलाइन डेस्क। बर्मिंघम में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की पहलवान ओलिंपियन दिव्या काकरान ने कांस्य पदक जीतकर अपने पिता से किए वादे को पूरा किया। बर्मिंघम जाने से पहले दिव्या ने पिता से वादा किया था कि मेडल जीतकर ही लौटूंगी। शुक्रवार रात को जब दिव्या ने विदेशी खिलाड़ी को पटखनी देकर मेडल नाम किया, तो पिता का सिर गर्व से ऊंचा हो गया।

दिव्या के घर से लेकर आसपड़ोस के लोग खुशियां मनाने लगे। दिव्या का मैच शुरू होने से पहले ही परिवार के लोग टीवी के सामने बैठ गए थे। दिव्या के मैच की वजह से परिवार ने घर के सारे काम जल्दी निपटा लिए थे। दिव्या के पिता सूरज पहलवान ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेल में दिव्या ने दूसरी बार मेडल जीता है। बर्मिंघम में चल रहे खेलों के लिए दिव्या ने बहुत कठिन परिश्रम किया। न धूप देखी न बारिश, उसके अंदर एक ही जि़द थी कि उसे मेडल जीतकर आना है।

दिव्या की जीत से बदलेगी परिवार की किस्मत

दिव्या का परिवार मूलरूप से यूपी के मुजफ्फरनगर का रहने वाला है। वह अभी परिवार के साथ गोकलपुरी में एक छोटे से घर में पिछले 20 साल से किराये पर रह रही है। स्वजन का कहना है दिव्या की जीत से परिवार की किस्मत बदलेगी। दिव्या के साथ ही परिवार के बाकी लोगों का भी सपना है कि वह अपना घर खरीदकर रहे।

भाइयों के लिए आदर्श हैं दिव्या

दिव्या के दो भाई हैं। दोनों ही पहलवानी कर रहे हैं। दिव्या ने अपने बड़े भाई देव काकरान के साथ देशी अखाड़े से पहलवानी की शुरुआत की थी। अखाड़े की माटी का रंग दिव्या पर ऐसा चढ़ा की, फिर उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। वह क्षेत्रीय प्रतियोगिता से लेकर अंतरराष्ट्रीय खेल में 80 पदक जीत चुकी हैं। दिव्या के भाइयों ने कहा कि उन्हें अपनी बहन पर गर्व है। वह बहन को अपना आदर्श मानते हैं। पुरुषों को अपनी बहनों को खेल में आगे बढ़ाना चाहिए, इस सोच को बदले की महिला घर में रहकर चूल्हा-चौका करती है, महिला अखाड़े में उतरकर पुरुषों को धूल भी चटा सकती है।