चौथी बेटी हुई तो परिवार ने नाम रखा था 'अंतिम', अब कुश्ती के मैट पर सिल्वर जीतकर बढ़ाया देश का मान
तीन बेटियों के बाद जब चौथी बेटी ने जन्म लिया तो परिवार ने उसका नाम अंतिम रखा।

अंतिम

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सुभाष चंद्र, जागरण हिसार। तीन बेटियों के बाद जब चौथी बेटी ने जन्म लिया तो परिवार ने उसका नाम अंतिम रखा। हरियाणा के गांवों में ऐसे नामों के पीछे उस दौर की एक सहज पारिवारिक भावना रही है कि अब बस, इससे आगे बेटी न हो। मगर हिसार जिले के गांव भगाना की इस बेटी की कहानी नाम पर खत्म होने के बजाय यहीं से आगे बढ़ी।
बड़ी बहन सरिता को कबड्डी खेलते देख अंतिम के भीतर भी खेल की ललक जगी और करीब 12 वर्ष की उम्र में उसने कुश्ती को अपना लिया। गांव के दंगल से शुरू हुई यह पहलवान अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर परिवार और हिसार की पहचान बन चुकी है। एशियाई खेलों के 53 किग्रा वर्ग में अंतिम ने रजत पदक जीता।
स्वर्ण मुकाबले में जापान की मो कियोका से 1-9 से हार मिली, लेकिन फाइनल तक पहुंचने का सफर भी उसकी लगातार बढ़ती उपलब्धियों की कहानी कहता है। अंतिम ने भगाना में कुश्ती का अभ्यास शुरू किया। शुरुआती दौर में स्थानीय दंगलों में लड़कों के साथ भी मुकाबले किए।
खेल को आगे बढ़ाने के लिए परिवार ने उसका पूरा साथ दिया। प्रशिक्षण की बेहतर सुविधा के लिए परिवार भगाना से हिसार आकर रहने लगा। पिता ने बेटी के प्रशिक्षण पर संसाधन लगाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
स्वर्णिम स्वप्न के सामने जापानी पहलवान भारी पड़ी
फाइनल में जापान की मो कियोका ने शुरुआत से मुकाबले पर पकड़ बनाए रखी। पहले दौर में अंतिम कोई अंक नहीं बना सकीं और कियोका ने 2-0 की बढ़त ली। दूसरे दौर में भी जापानी पहलवान ने बढ़त कायम रखी और मुकाबला 9-1 से अपने नाम किया। अंतिम को रजत से संतोष करना पड़ा, लेकिन एशियाई खेलों में यह उनके पदक का अगला पड़ाव है।
