साहब, जल संरक्षण जितना ही आवश्यक है भाषा संरक्षण, आमजन को समझ ही न आए तो वह संवाद कैसा?
हिमाचल प्रदेश में सरकारी संचार में भाषा संरक्षण, विशेषकर हिंदी के महत्व को जल संरक्षण जितना ही आवश्यक बताया गया है।

साहब, जल संरक्षण जितना ही आवश्यक है भाषा संरक्षण (फाइल फोटो)
HighLights
सरकारी संचार में हिंदी भाषा के महत्व पर बल दिया गया
जल शक्ति विभाग की अंग्रेजी पुस्तक पर सवाल उठाए गए
जनता तक प्रभावी पहुंच के लिए सरल भाषा आवश्यक
नवनीत शर्मा, राज्य संपादक। विषय पर आने से पहले एक सत्यकथा आपकी प्रतीक्षा में है...आइए! कुछ वर्ष पूर्व पशुपालकों पर आधारित एक कार्यक्रम पटना में था जहां करीब 300 लोग बुलाए गए थे।
इन्होंने सरकारी योजनाओं से लाभान्वित होकर अपनी आर्थिक स्थिति को संवारा था। जितने अधिकारी बोले, सब अंग्रेजी में...बीज भाषण भी अंग्रेजी में हुआ और कार्यक्रम विषयक सूचना/सामग्री भी अंग्रेजी में रही। उसके बाद केंद्र से आए अधिकारी का संबोधन था और अंत में मंत्री का।
केंद्रीय अधिकारी ने कहा, ‘इस हाल में आठ दस लोग ही अंग्रेजी समझ सके होंगे, यह अन्याय है। यदि भाषण और अब यह पुस्तक फ्रेंच या ग्रीक में होंगे तो भेदभाव की गुंजाइश नहीं रहेगी।" उसके बाद सब हिंदी में संवाद करने लगे।
यह कहानी इसलिए स्मरण हो आई क्योंकि हाल में हिमाचल के जलशक्ति विभाग ने एक पुस्तक का प्रकाशन किया है। नाम है ‘ड्राप्स आफ चेंज, इम्पेक्टफुल स्टोरीज आफ जलशक्ति विभाग हिमाचल प्रदेश।’ इसमें 100 उदाहरण हैं या कहें कि सफलता की कहानियां हैं कि कैसे जल संरक्षण किया, पानी घर तक आया और कितनी पंचायतों की प्यास बुझी इत्यादि।
कोई विभाग जब उत्कृष्ट कार्य करे तो उसे पुस्तक में सहेजना सराहनीय है। एक तो उत्कृष्टता दर्ज हो जाती है... दूसरे, अन्य अधिकारी ही नहीं, समाज भी जल संरक्षण के कार्यों का अनुकरण कर सकता है।
तीसरा लाभ यह कि जनता और अपने अपने क्षेत्रों में डटे कर्मचारी भी अनुभव करें कि उनकी कर्तव्यनिष्ठा दर्ज हो रही है। लेकिन जल संरक्षण के लिए जो सदिच्छा या श्रम संवर्धन दिखाया गया, उसके साथ ही संप्रेषण और भाषा संरक्षण का ध्यान कौन रखेगा?
हिंदी, हिंदी करते हुई हमारी समूची व्यवस्था ने यह कैसे मान लिया कि पंप आपरेटर से लेकर लाइनमैन और फिटर तक सब अंग्रेजी ही समझते हैं, हिंदी नहीं? सवाल अंग्रेजी बनाम हिंदी का तो है ही नहीं, यह तो सामान्य समझ की बात है कि कैसा कार्य, किस वर्ग को किस भाषा में पढ़ाया जाए कि वह अधिकाधिक लोगों तक पहुंचे।
जब तक, मक्खी पर मक्खी मारने को शोध और नवाचार का नाम दे देने के अभ्यस्त अधिकारी आसीन हैं, हिंदी को कहीं बाहर से घबराने की आवश्यकता क्यों हो? धन्यवाद इसलिए कि वेबसाइट खोलते ही एक दो संदेश हिंदी में हैं। लेकिन जब हिंदी चुनें तो "प्रोग्राम्स" का शीर्षक कार्यक्रम में नहीं, "कार्यक्रमों" में बदल जाता है...यानी यह हमारे "कार्यक्रमों" हैं।
शुद्ध जस का तस भी नहीं, अशुद्ध रूप से अनुवाद चिपकाना इसी को कहते हैं। 2020 में जलशक्ति बनकर भी कतिपय अधिकारी सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य के युग में जी रहे हैं। हाल का एक और उदाहरण हिमाचल पथ परिवहन निगम के पचास वर्ष पूरे होने पर दिखा था जब एक काफी टेबल बुक अंग्रेजी में छपी।
यकीनन उसमें उपलब्धियां होंगी क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र में बस संचालन आसान काम तो है नहीं। कई कठिन रास्ते हैं, कहीं हिमपात वाले क्षेत्र हैं।
उन कहानियों के नायक चालक, परिचालक आदि ही रहे होंगे। 10,853 कर्मचारियों और करीब 8000 पेंशनरों वाला निगम उसी पुस्तक के माध्यम से आसानी से कितने लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता था यदि वह हिंदी में रही होती।
कुछ प्रतियां बसों में रखवाई जा सकती थीं। लेकिन नहीं, उद्देश्य शायद और रहा हो। जैसे यह कि दिल्ली तक काम पहुंच जाए बस...और दिल्ली में तो किसी को हिंदी कहां आती है..!
हिंदी के साथ त्रासदी यह है कि कार्यालयों में जहां हिंदी से काम चलना चाहिए, वहां मसूरी से लौटे अधिकारी अंग्रेजी को ही जलपान करवाते हैं और जब व्यक्ति थाने या न्यायालय में जाता है तो उसे क्षोभ होता है कि वहां जो भाषा प्रयोग की जाती है, उससे पिंड किस जन्म में छूटेगा।
वहां, भाषा दिवस पर पुरस्कार के लिए प्रविष्ट होने के उद्देश्य से लिपि देवनागरी ही रहेगी लेकिन घटनास्थल को जा ए बकूहा लिखा जाएगा, जबकि सही शब्द वकूआ है। आला अफसर यानी उच्च अधिकारी और वही आला ए वारदात हो जाता है तो हथियार बन जाता है।
इलाका ए हदूद का रवाना आदि ऐसे शब्द हैं जो थानों के रजिस्टरों पर, ई रोजनामचों पर अमिट काई की तरह बैठे हुए हैं। पावर आफ अटार्नी के लिए आज भी पावर आफ अटार्नी लिखा जाता है और देने वाले को मुख्तार देहिंदा।
अधिकार पत्र लिखने से पता नहीं क्या समस्या है। अधिकार पत्र देने वाले अधिक हों तो उन्हें दहिंदगान लिखा जाता है। किंतु तहसील के बाहर टाइप
करने वाले मुख्तार दहिंदागण लिखता है। एक बार विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई जब टाइप करने वाले ने देहिंदगान को दहिंदागण से भी आगे जाकर दरिंदागण लिख दिया। इस कारण से या उस कारण से, इस प्रयोजन या उस प्रयोजन से यदि उद्देश्य यही है कि किसी को कुछ पता न चले तो यही शैली उपयुक्त है।
पर यदि पर्दे उठाने हैं, जन की भाषा में जन तक पहुंचना है तो नीति नियंता हों या अधिकारी, हम हों या आप... विचार अवश्य करना चाहिए। हिंदी का अपमान कहीं संप्रेषण का अपमान ही न बन जाए। क्या ऐसा करने वाले सम्मान के पात्र होंगे?।
(लेखक दैनिक जागरण, हिमाचल प्रदेश के संपादक हैं)
