पुरी, जागरण संवाददाता

श्रीजगन्नाथ महाप्रभु के द्वादश यात्रा के बीच अन्यतम प्रसिद्ध दोलयात्रा भक्तिपूर्ण परिवेश में सम्पन्न हो गई है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु श्रीमंदिर में श्रीजीओं की सोने के वेश दर्शन करने के साथ दोलवेदी में झूला झूल रहे दोल गोविन्द ठाकुर, लक्ष्मी तथा सरस्वती देवी का भी दर्शन किए हैं। रीति रिवाज के अनुसार ब्रह्मंा जी के आदेश में राजा इंद्रद्युम्न दोल यात्रा शुरू किए थे। फागु दशमी से श्रीमंदिर में दोलयात्रा का शुभारंभ हुआ है। श्री जगन्नाथ महाप्रभु के दोल यात्रा बसंत महोत्सव, मदन महोत्सव और फलगू उत्सव के रूप में मनाया जाता है। नीलाद्री महोदय, स्कन्द पुराण, यात्रा भागवत, नीलाद्री अर्चन चंद्रिका, ब्रह्मंापुराण, भविष्य पुराण और सदानंद संग्रह आदि संस्कृत ग्रंथ में दोल उत्सव का वर्णन है। श्री जगन्नाथ महाप्रभु के बसंत उत्सव को आधारकर रचना किया गया है बसंत महोत्सव महाकाव्यम। वैष्णव कवि शरण दास के चाचेरी लीला, मदला पांगी और कवि ंिवश्वनाथ खुण्टिया के विभिन्न रचना में दोल उत्सव के बारे में उल्लेख किया गया है। पहले से यह यात्रा दोलमण्डप साही स्थित दोलवेदी में सम्पन्न हो रहा था। राजा मुकुंद देव नूतन दोलवेदी निर्माण किए थे। श्रीजगन्नाथ, श्री बलभद्र, गुण्डिचा यात्रा की तरह 1561 साल में श्रीमंदिर से दोलवेदी को विजे किए थे। दोलवेदी में लगाए गए झूला टूट जाने से प्रभु बलभद्र के श्रीभुज टूट गया था। इसके बाद दोलयात्रा के अवसर पर महाप्रभु के चलंति प्रतिमा दोल गोविन्द, लक्ष्मी सरस्वती के साथ दोलवेदी को पधारने की रीति रिवाज शुरू हुआ है। श्रीमंदिर में मंगल आरती, मइलम, तड़पलागी, द्वारपाल पूजा आदि नीति सम्पन्न होने के बाद भोग लगाकर दोल गोविन्द भीतर सिंहासन को विराजमान किए थे। इसके बाद अन्य नीति सम्पन्न की गई। महाप्रभु दोल वेदी में विराजमान होने के बाद सर्व साधारण दर्शन हुआ। भक्त महाप्रभु का दर्शन करने के साथ अबीर और गुलाल लगाए थे।

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