पुरी, जागरण संवाददाता

पवित्र दोल पूर्णिमा के मौके पर परंपरा अनुसार रत्न सिंहासन पर श्रीजीओं को राजवेश में सज्जिात किया गया था। लाखों श्रद्धालु महाप्रभु के इस वेश का दर्शन किए है। श्रीमंदिर के अन्दर दर्शनार्थियों की सुरक्षा के लिए काफी मात्रा में पुलिस बल तैनात थे। उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल से लाखों भक्तों का यहां समागम हुआ। गौरतलब है कि दशहरा, पौषपूर्णिमा या पुष्याभिषेक, दोलपूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा में रत्न सिंहासन पर महाप्रभुओं को इस मनोरम वेश में सजाया जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी में रथ के ऊपर तीनों महाप्रभुओं को इसी वेश में सजाया जाता है। श्रीजीओं के राजवेश 1232 साल से आरंभ होने की मान्यता है। दोलपूर्णिमा के मौके पर महाप्रभुओं को पाटवस्त्र में सज्जिात कराने के साथ विभिन्न स्वर्ण अलंकार तथा आभूषण में भूषित किया गया था। श्री बलभद्र, श्री पयर, श्रीभुज, किरिटि, ओड़ियानी, कुण्डल, चन्द्रसूर्य, आड़कानी, घागड़ामाली, कदम्बलमाली, तिलक-चन्द्रिका और त्रिखण्डिका, कमरपट्टी में लगाने के साथ हाथों में हल और मूशल धारण किए थे। देवी सुभद्रा को किरिटी, ओड़ियानी, खागड़ामाली, कदम्बमाली, सोने की सेवतीमाली में विभुषित किया गया था। दो तड़गी देवी का आयुध था। महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वर्ण श्रीभुज, श्री पयर, किरिटी, आड़कानी और सोने के विभिन्न माली पहने थे। श्रीभुज में सोने का चक्र और चांदी का शंख धारण किए थे। महाप्रभु के इस राजराजेश्वर वेश दर्शन करने को देर रात तक करीबन 2 लाख भक्त दर्शन किए हैं।

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