जागरण संवाददाता, पुरी : महाप्रभु श्रीजगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के मौके पर श्रीक्षेत्र धाम पुरी में लाखों श्रद्धालु शामिल हुए। जाति, धर्म से परे लोग भक्ति-भाव में डूबे रहे। प्रभु श्रीजगन्नाथ अपना रत्‍‌न सिंहासन छोड़कर अपने भक्तों से एकाकार होने बड़दांड पहुंचे।

श्रीमंदिर प्रशासन की ओर से निर्धारित कार्यक्रम के अनुरूप सुबह 5 बजे मंगल आरती की गई। इसके बाद मइलम, तडपलागी, रोश होम व अवकाश नीतियां संपन्न की गई। 6 बजकर 15 मिनट पर सूर्य पूजा व द्वार पूजा के बाद भगवान सजाए गए। इसके बाद तीनों रथों की पूर्ण विधि-विधान के अनुसार प्रतिष्ठा की गई। रथों पर ध्वजा बांधने के उपरांत 9.15 मिनट पर पहंडी आरंभ की गई। सबसे पहले सुदर्शन जी पहंडी के जरिए देवी सुभद्रा के देवदलन रथ पर आरूढ़ हुए। सुदर्शन जी के रथारूढ़ होने के बाद 10 बजे बलभद्र जी की पहंडी आरंभ हुई। इसके उपरांत 10.30 बजे देवी सुभद्रा की पहंडी एवं अंत में 11.00 बजे महाप्रभु श्री जगन्नाथ पहंडी यानी सेवायतों की सहायता से मंद-मंद चलते हुए 22 पावच्छ को पार करते हुए भक्तों के मध्य पहुंचे। फूल व सोल से बने सुसज्जित मनोरम मुकुट जिसे स्थानीय भाषा में टाहिया कहा जाता है से सजी प्रभु की प्रतिमा की झलक भर पाने को आतुर लोगों की लम्बी प्रतीक्षा का अंत हुआ। चारों दिशाओं में जय जगन्नाथ की ध्वनि गुंजायमान हो रही थी। भक्तों में अपार उत्साह था। अनेक भक्त विभिन्न समूहों के साथ नृत्य, गीत, भजन-कीर्तन में मग्न रहे। घंट-घंटा, तूरी-भेरी, मृदंग-झांझ, तेलिंगी बाईद और तरह-तरह के वाद्य यंत्रों के भक्ति भाव से सराबोर भक्त थिरकते रहे। भगवान का यह लौकिक पर्व ओडिशा का गण पर्व बन गया है। सदियों से लोग रथयात्रा का आयोजन करते आ रहे हैं।

तीनों विग्रहों के रथारूढ़ होने के बाद रथ पर वेश सजाए गये 1 बजे चिता लागी की गई। इसके उपरांत पारंपरिक ढंग से पूरी के गजपति महाराज पालकी में सवार होकर रथों के निकट पहुंचे । महाप्रभु के प्रथम सेवक होने का अधिकार पाने वाले गजपति महाराज दिव्य सिंहदेव ने रथों पर सोने की मूठ वाली झाड़ू से सफाई की। इसे स्थानीय भाषा में छेरा-पहंरा कहा जाता है। इसका सांकेतिक अर्थ यह भी है कि भगवान के सामने कोई भी बड़ा नहीं है। यहां तो राजा भी सामान्य सेवक की तरह झाड़ू लगाता है। रथयात्रा में शामिल होने के लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक सहित अनेक वरिष्ठ मंत्री पुरी पहुंचे। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने तीनों रथों के सामने जाकर श्रद्धापूर्वक अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हुए जगत-नियंता से आशीर्वाद मांगा। दारु ब्रह्मंा,परमब्रह्मंा, जगत के नाथ, महाप्रभु, पुरुषोत्ताम, महाबाहु, बड़ ठाकुर, कालिआ ठाकुर, चकाडोला, चकानयन, जैसे अनेक नाम से परिचित श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा समूचे विश्व में अनोखी घटना मानी जाती है। देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं की उत्कंठा देखते ही बन रही थी। पुरा का पुरा बड़दांड भक्तों से अटा पड़ा था। शहर के प्रमुख स्थलों पर पुलिस के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।

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