जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर : जैविक कृषि में अपार संभावनाएं है। ऐसे में कृषि स्नातकों व कृषि विश्वविद्यालयों के युवा अध्यापकों को किसानों को स्वावलंबी बनाने आगे आना चाहिए। यह आह्वान जैविक किसान एवं आइआइटी, खड़गपुर के पूर्व छात्र एवं प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में डीन रह चुके विशाल ¨सह ने किया है। सिंह का कहना है कि भारत के सभी कृषि स्नातकों एवं कृषि विश्वविद्यालयों के युवा अध्यापकों को कम से कम एक महीने कृषि प्रधान गांवों में बिताकर कृषि को ग्राम स्वावलंबन का एक सशक्त साधन बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैविक खेती आज के समय की मांग है और किसानों को कम लागत में उत्तम गुणवत्ता की फसल उत्पादित करने का एक प्राकृतिक माध्यम भी। वर्तमान की भयानक परिस्थिति से हम सभी परिचित हैं, पूरे भारत में रसायन और कीटनाशकों का खेती में प्रचुर इस्तेमाल हो रहा है, परिणामस्वरूप खेती की लागत बढ़ रही है, भूमि अपनी उर्वरा एवं प्राकृतिक स्वरूप खोती जा रही है। पर्यावरण प्रदूषण और मनुष्य के स्वास्थ्य में किस हद तक गिरावट आई है, यह सबके सामने है। किसान अपनी पैदावार से प्राप्त लाभांश का बहुत बड़ा हिस्सा उर्वरक और कीटनाशकों में लगा देता है। किसान यदि खेती में अधिक मुनाफा कमाना चाहता है तो उसे जैविक खेती की तरफ जाना ही होगा।

उल्लेखनीय है कि विशाल ¨सह और उनके साथी ओडिशा के लगभग सभी जिलों में जैविक कृषि के प्रसार के लिए प्रति माह लगभग 4 से 5 प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर युवा किसानों को रासायनिक खेती से बचने और गौ आधारित कृषि से स्वावलंबन के विषय में किसानों को प्रशिक्षित करते है। वर्तमान में एक महीने के अपने प्रशिक्षण शिविर में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी पंजाब के दर्जनों कृषि छात्रों को जैविक कृषि का प्रशिक्षण दे, उनको समग्र ग्राम विकास पर आधारित कृषि उद्यम की शुरुआत कर भारत विकास के नए आयामों का नेतृत्व करने की प्रेरणा दे रहे है। उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद स्वयं के गांवों में जाकर वहां के किसानों को रसायन मुक्त खेती सिखाना ही हमारी गुरु दक्षिणा होगी ।

Posted By: Jagran