भुवनेश्‍वर, ऑनलाइन डेस्‍क। ‘जन्‍म के बाद नहीं बल्‍कि मां के गर्भ में ही मातृभाषा का होता है ज्ञान’ महाभारत के अभिमन्‍यु का उदाहरण देते हुए राष्‍ट्रीय बौद्धिक मंच के बुदि्धजीवियों का कहना है कि किसी पर भाषा थोपी नहीं जा सकती या जबरन उनकी मातृभाषा को बदला नहीं जा सकता। ऐसी ही एक कोशिश हुई थी भारत पाकिस्‍तान बंटवारे के समय जब पाकिस्‍तान ने बांग्‍लादेश की मातृभाषा जबरन उर्दू बनाने की कोशिश की थी हालांकि उसे इसमें कामयाबी नहीं मिली।

राज्‍यगान है- ‘बंदे उत्‍कल जननि’

‘बन्दे उत्कल जननी’ को कांतकबि लक्ष्मीकांत महापात्र ने लिखा है। यह उड़िया भाषा की देशभक्ति गीत है। 1 अप्रैल 1936 में आजादी के बाद इसे ओडिशा का राज्य गान बनाया गया था। इस गीत में असुरक्षा की स्थिति में अपने आत्म-सम्मान को बरकरार रखने का संदेश दिया गया है। उत्कल जननी का अर्थ है मां उत्कल की जय। अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर एक चर्चा का आयोजन किया गया। इसका थीम था- ‘मातृभाषा व राष्‍ट्र निर्माण’। इसपर चर्चा के लिए पैनल में कई बुद्धिजीवी आमंत्रित थे। यह आयोजन 23 फरवरी 2020 को दिल्‍ली के आइआइटी में भारती स्‍कूल ऑफ टेलीकम्‍युनिकेशंस टेक्‍नोलॉजी एंड मैनेजमेंट में किया गया।

पैनल चर्चा का हुआ आयोजन

कार्यक्रम की शुरुआत दीपों के प्रज्‍जवलन के साथ हुई। इसके बाद सस्‍मिता दास ने ओडिशा के राज्‍य गान ‘वंदे उत्‍कल जननि’ का गान किया। आरबीएम के अध्‍यक्ष संग्राम पटनायक ने संगठन के मिशन व मूल्‍यों के बारे में विस्‍तार से बताया। इसके बाद पैनल चर्चा शुरू की गई। पैनल चर्चा का समापन संग्राम पटनायक के संबोधन के साथ हुआ। इस चर्चा में गुम होती जा रही उड़ीया भाषा को वापस अस्‍तित्‍व में लाने के प्रयासों पर चर्चा किया गया।

जबरन नहीं थोपी जा सकती भाषा

पैनल पर चर्चा के दौरान भारत भूषण ने अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्‍व के बारे में बताया। उन्होंने मातृ भाषा को मजबूत बनाने व राष्‍ट्र निर्माण की वकालत की। उन्होंने इस दिवस के इतिहास के बारे में भी बताया कि किस तरह बंटवारे के बाद पाकिस्‍तान ने पूर्वी पाकिस्‍तान जो अब बांग्‍लादेश है, पर जबरन उर्दू भाषा थोपने की कोशिश की थी। लेकिन वहां के लोगों ने हार नहीं मानी और विरोध जताया आखिरकार उनकी आधिकारिक भाषा बांग्‍ला ही रखी गई।

इसके बाद पैनल में शामिल उदयनाथ शाहू ने उड़िया भाषा के महत्‍व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पुरानी भाषाओं में से एक है। उन्‍होंने महाभारत के अभिमन्‍यु का उल्‍लेख करते हुए कहा, ‘जन्‍म के बाद बच्‍चे को भाषा नहीं सिखाई जाती वह तो मां के गर्भ में ही 6 माह के बाद सीखता है।’ ऐसा ही कुछ बलराम पानी ने भी कहा। वहां अन्‍य बुद्धिजीवी भी मौजूद थे।

यूनेस्‍को का फैसला

हर साल 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। दुनिया भर में मनाया जाने वाला इस दिन थीम इस बार ‘Indigenous languages matter for development, peacebuilding, and reconciliation’ रखा गया। वर्ष 1999 के नवंबर को यूनेस्‍को ने इसे अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाए जाने का फैसला किया। ढाका विश्‍वविद्यालय के छात्रों व कार्यकर्ताओं ने 21 फरवरी 1951 को तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषा संबंधित नीति का विरोध  अपनी मातृभाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए किया था। आधिकारिक तौर पर ये बांग्‍लादेशी भाषा को दर्जा देने की मांग कर रहे थे। इस विरोध को रोकने के लिए पाकिस्तानी पुलिस ने गोलियां चलाईं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा और आखिरकार आधिकारिक भाषा के तौर पर बांग्‍ला को ही दर्जा दिया गया।

Posted By: Monika Minal

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