विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

सरकार बदली पर नहीं बदले हालात: ओडिशा के रायगढ़ा में खाट बनी एंबुलेंस, बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे ग्रामीण

Published: Sat, 12 Sep 2026 04:41 PM (IST)

ओडिशा में सरकार बदलने के बावजूद ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बरकरार है। रायगढ़ा जिले में एक गर्भवती ...और पढ़ें

ओडिशा के रायगढ़ा में खाट बनी एंबुलेंस

ओडिशा के रायगढ़ा में खाट बनी एंबुलेंस

HighLights

  1. रायगढ़ा में गर्भवती महिला को खाट पर अस्पताल ले जाना पड़ा।

  2. खराब सड़कों के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाई।

  3. ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।

शेषनाथ राय, भुवनेश्वर। ओडिशा में 24 वर्षों तक सत्ता में रही बीजू जनता दल (बीजद) सरकार को जनता ने वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में इस उम्मीद के साथ सत्ता से बाहर किया था कि नई सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत समस्याओं का समाधान करेगी। 

लोगों को भरोसा था कि सड़क, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर होगी। मगर लगभग दो वर्ष बीतने के बाद भी कई दूरदराज गांवों की तस्वीर नहीं बदली है। आज भी प्रदेश के अनेक आदिवासी और दुर्गम इलाकों से मरीजों और गर्भवती महिलाओं को खाट या पालकी पर अस्पताल पहुंचाने की खबरें सामने आ रही हैं।

तीन किलोमीटर तक खाट पर उठाकर ले जाना पड़ा

ताजा मामला रायगढ़ा जिला गुड़ारी प्रखंड शिरीगुडा ग्राम पंचायत के सातकडा गांव से सामने आयी है, जहां पक्की सड़क नहीं होने के कारण सुमी काड्राक  (9 महीने की) गर्भवती महिला को करीब साढ़े तीन किलोमीटर तक खाट पर उठाकर ले जाना पड़ा। इसके बाद उसे एंबुलेंस तक पहुंचाया गया और अस्पताल भेजा गया। यह घटना एक बार फिर ग्रामीण बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है।

जानकारी के अनुसार, संबंधित गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। गांव के लिए दो रास्ते हैं, जिनमें एक ओर नाला पड़ता है जबकि दूसरा रास्ता कीचड़ और दलदल से भरा हुआ है। लगातार बारिश के कारण दोनों मार्गों पर आवागमन बेहद कठिन हो गया है। ऐसे में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी। गर्भवती महिला की तबीयत बिगड़ने पर परिजनों और ग्रामीणों ने उसे खाट पर लिटाया और करीब 3.5 किलोमीटर तक पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया, जहां एंबुलेंस खड़ी थी।

हालात जस के तस बने हुए

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की मांग वर्षों से की जा रही है। इस समस्या को लेकर कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का ध्यान भी आकर्षित कराया गया, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। कुछ महीने पहले भी इस सड़क की बदहाली को लेकर खबरें प्रकाशित हुई थीं, मगर हालात जस के तस बने हुए हैं।

प्रदेश में भाजपा सरकार अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर चुकी है और विकास को लेकर लगातार बड़े दावे किए जा रहे हैं। गांवों तक सड़क, बिजली, पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद रायगढ़ा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों की यह तस्वीर बताती है कि विकास की रफ्तार अभी भी कई गांवों तक नहीं पहुंच सकी है।

चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने से जान का खतरा 

विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़ने का माध्यम भी है। सड़क नहीं होने का सबसे अधिक खामियाजा गर्भवती महिलाओं, गंभीर मरीजों, बच्चों और बुजुर्गों को भुगतना पड़ता है। समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने से जान का खतरा भी बढ़ जाता है।

रायगढ़ा की यह घटना सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन सैकड़ों दूरस्थ बस्तियों की हकीकत है जहां आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सवाल यह है कि सरकार बदलने के बाद भी यदि ग्रामीणों को गर्भवती महिलाओं और मरीजों को खाट पर ढोकर अस्पताल पहुंचाना पड़ रहा है, तो विकास के दावों का लाभ आखिर जमीनी स्तर पर कब तक पहुंचेगा? यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।

यह भी पढ़ें- ओडिशा में मिले ओरंगुटान शावकों की ₹5 करोड़ में डील, काली थार से गहराया वन्यजीव तस्करी का रहस्य