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राज्यसभा चुनाव में 'बगावत' की आंच: ओडिशा में BJD के 5 विधायकों को हाई कोर्ट का नोटिस, दांव पर सदस्यता!

Published: Thu, 29 Oct 2026 08:44 PM (IST)

ओडिशा हाई कोर्ट ने राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के मामले में बीजद के पांच विधायकों को नोटिस जारी किया है।

ओडिशा हाई कोर्ट ने राज्यसभा क्रॉस वोटिंग मामले में बीजद के पांच विधायकों को भेजा नोटिस

ओडिशा हाई कोर्ट ने राज्यसभा क्रॉस वोटिंग मामले में बीजद के पांच विधायकों को भेजा नोटिस

HighLights

  1. राज्यसभा क्रॉस वोटिंग पर बीजद के पांच विधायकों को नोटिस।

  2. विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

  3. मामले की अगली सुनवाई 11 जनवरी, 2027 को होगी।

जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के मामले में ओडिशा हाई कोर्ट ने गुरुवार को बीजू जनता दल (बीजद) के पांच विधायकों को नोटिस जारी किया।

अदालत ने सभी विधायकों को अगली सुनवाई से पहले अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 जनवरी, 2027 को होगी।

नोटिस पाने वाले विधायकों में अरविंद महापात्र, सुभासिनी जेना, सनातन महाकुड़, सौविक बिस्वाल और चक्रमणि कंहार शामिल हैं।

बीजद विधायक प्रमिला मलिक ने राज्यसभा चुनाव में कथित क्रॉस वोटिंग के आरोप में पार्टी के आठ विधायकों की सदस्यता रद करने की मांग की थी।

इसी मामले में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं।

अध्यक्ष के फैसले को दी गई है चुनौती

ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष ने जून में बीजद की ओर से दायर अयोग्यता याचिका को विस्तृत आदेश के साथ खारिज कर दिया था।

इसके बाद पार्टी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में आठ रिट याचिकाएं दायर की थीं। गुरुवार को इनमें से पांच याचिकाओं पर सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान विधानसभा अध्यक्ष की ओर से ओडिशा के महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य अदालत में उपस्थित हुए।

उन्होंने बताया कि पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ता प्रमिला मलिक ने रिट याचिका वापस लेकर नए सिरे से विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष जाने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, अध्यक्ष की ओर से उन्होंने इस मांग का विरोध किया।

महाधिवक्ता ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता पर फैसला करते समय विधानसभा अध्यक्ष अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ के फैसले के अनुसार, अध्यक्ष का आदेश न्यायिक प्रकृति का होता है।

हाई कोर्ट इसकी वैधता की समीक्षा कर सकता है, लेकिन अध्यक्ष अपने आदेश को मनमाने ढंग से वापस लेकर उसी मामले में नए सिरे से विचार नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी रिट याचिका स्वेच्छा से वापस ले सकता है, लेकिन संबंधित पक्षों को सुने बिना हाई कोर्ट उसे अध्यक्ष के समक्ष नई याचिका दायर करने का निर्देश नहीं दे सकता।

महाधिवक्ता के अनुसार, अदालत ने इस दलील को स्वीकार किया। इसके बाद प्रमिला मलिक ने अपनी पिछली मांग वापस लेते हुए मामले का गुण-दोष के आधार पर निर्णय कराने पर सहमति जताई।