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संकट में ओडिशा की 'ब्लू इकोनॉमी': एक तरफ जमीन निगलती समंदर की लहरें, दूसरी तरफ ढाल बने मैंग्रोव वन

Published: Fri, 05 Jun 2026 11:55 AM (IST)

ओडिशा की तटरेखा पर समुद्री कटाव और जलवायु परिवर्तन का गहरा संकट है, जिससे 'ब्लू इकोनॉमी' प्रभावित हो रही है और लोग विस्थापित हो रहे हैं।

ढाल बने मैंग्रोव वन (जागरण फोटो)

ढाल बने मैंग्रोव वन (जागरण फोटो)

HighLights

  1. ओडिशा की 25% तटरेखा गंभीर समुद्री कटाव की चपेट में।

  2. मैंग्रोव वन क्षेत्र में 16.6% की महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज।

  3. जलवायु परिवर्तन से विस्थापन और 'ब्लू इकोनॉमी' पर असर।

संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। ओडिशा की 480 किलोमीटर लंबी तटरेखा आज एक गहरे द्वंद्व की कहानी कह रही है। एक तरफ बंगाल की खाड़ी की बेकाबू लहरें जमीन को निगल रही हैं, तो दूसरी ओर मैंग्रोव वनों की हरियाली उस विनाश के सामने ‘प्राकृतिक ढाल’ बनकर खड़ी है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में राज्य का तटीय भूगोल चेतावनी भी है और उम्मीद भी।

समंदर के बढ़ते कहर से मिटती जमीन, उजड़ती यादें 

केंद्रापाड़ा जिले का सतभाया इलाका आज जलवायु संकट का जीता-जागता दस्तावेज बन चुका है। कभी सात समृद्ध गांवों का समूह रहा यह क्षेत्र अब समुद्र में समा चुका है। लहरों का शोर अब यहां बीते जीवन की कहानियां सुनाता है।

68 वर्षीय पंचू प्रधान, जो आज बगापटिया पुनर्वास कॉलोनी में एक छोटे से घर में जीवन गुजार रहे हैं, अपनी पीड़ा छिपा नहीं पाते। वे कहते हैं, “तीन कमरों का पुश्तैनी मकान, सामने लहलहाते खेत, पिता की समाधि सब कुछ समंदर ले गया।” पंचू जैसे हजारों लोग आज ‘जलवायु शरणार्थी’ बनकर अपनी जड़ों से कट चुके हैं।

25 प्रतिशत तटरेखा कटाव की चपेट में

ताजा आंकड़े बताते हैं कि ओडिशा की करीब 25 प्रतिशत तटरेखा (लगभग 140 किलोमीटर) गंभीर समुद्री कटाव की चपेट में है। केंद्रापाड़ा, पुरी, गंजाम और जगतसिंहपुर जिलों के 46 तटीय गांव ‘रेड जोन’ में चिन्हित किए गए हैं। पिछले एक दशक में समुद्र के जलस्तर में हर वर्ष औसतन 0.33 मिमी की वृद्धि दर्ज की गई है जो आने वाले बड़े खतरे की स्पष्ट चेतावनी है।

मैंग्रोव बने मजबूत कवच

इस भयावह परिदृश्य के बीच एक सशक्त सकारात्मक बदलाव भी दिख रहा है। भारत सरकार की नवीनतम वन सर्वेक्षण रिपोर्ट (आईएसएफआर-2023) के अनुसार, ओडिशा में मैंग्रोव वन बढ़कर 259.06 वर्ग किलोमीटर हो गया है।

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बीते दो वर्षों (2021-2023) में मैंग्रोव क्षेत्र में 1.55 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले एक दशक में यह विस्तार करीब 16.6 प्रतिशत तक बढ़ा है, यानी 222 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 259.06 वर्ग किलोमीटर हो गया। 

केंद्रापाड़ा जिले में अकेले लगभग 9.43 वर्ग किलोमीटर का इजाफा इस दिशा में हुए ठोस प्रयासों का प्रमाण है, जबकि पिछले चार वर्षों में राज्य भर में लगभग 9.89 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव क्षेत्र बढ़ा है।

भितरकनिका क्षेत्र, जो राज्य के कुल मैंग्रोव का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा समेटे हुए है, देश के सबसे महत्वपूर्ण मैंग्रोव इकोसिस्टम में शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये वन समुद्री तूफानों की तीव्रता कम करने, तटीय कटाव रोकने और कार्बन अवशोषण के जरिए जलवायु संतुलन बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

बिगड़ते जलवायु से लू और मानसून का असंतुलन 

अप्रैल 2026 में ओडिशा दोहरी मार झेल रहा है। एक ओर समंदर का बढ़ता खतरा, तो दूसरी ओर भीषण गर्मी। राज्य के 10 से अधिक शहरों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि तटीय वनों की कमी और पारिस्थितिक असंतुलन ने स्थानीय जलवायु चक्र को प्रभावित किया है।

अर्थव्यवस्था पर सीधे प्रहार से ‘ब्लू इकोनॉमी’ संकट में 

समुद्री कटाव केवल जमीन नहीं छीन रहा, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रहा है। खारा पानी खेतों में घुसने से धान की फसल बर्बाद हो रही है, जिससे किसानों का पलायन बढ़ रहा है। मछुआरों और तटीय व्यवसायों की आजीविका भी खतरे में है।

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ओडिशा आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ समंदर की बढ़ती भूख है, तो दूसरी ओर मैंग्रोव की ‘हरी ढाल’। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि संरक्षण, वृक्षारोपण और दीर्घकालिक जलवायु नीति को सख्ती से जमीन पर उतारा गया, तो यही हरियाली आने वाले समय में तट को बचाने की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

पंचू प्रधान जैसी हजारों कहानियां केवल दर्द नहीं, बल्कि चेतावनी भी हैं,अगर आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कल तट पर सिर्फ कहानियां बचेंगी, जमीन नहीं।

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