पुरी रथ यात्रा 2026: साल में 1 बार खुलता है सोने की ईंटों से बना कुआं, इसके जल से होता है भगवान जगन्नाथ का महास्नान
देवस्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन का 108 पवित्र कलशों से महास्नान होता है, जिसके लिए पुरी के स्वर्ण कूप का जल उपयोग किया जाता है।

साल में 1 बार खुलता है सोने की ईंटों से बना कुआं
HighLights
देवस्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों से होता है महास्नान।
महास्नान के लिए स्वर्ण कूप का पवित्र जल उपयोग होता है।
भगवान 15 दिन अनासार में रहकर आयुर्वेदिक उपचार लेते हैं।
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल(ओडिशा)। विश्व प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ धाम में रथयात्रा का शुभारंभ देवस्नान पूर्णिमा से माना जाता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन का 108 पवित्र कलशों के जल से महास्नान कराया जाता है।
इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद महाप्रभु 15 दिनों के लिए 'अनासार' (एकांतवास) में चले जाते हैं। इस अवधि में श्रद्धालुओं को उनके दर्शन नहीं होते और रथयात्रा तक मंदिर की परंपराएं विशेष नियमों के अनुसार संचालित होती हैं।
सोने के कुएं से निकाला जाता है स्नान का पवित्र जल
महास्नान के लिए मंदिर परिसर स्थित पवित्र स्वर्ण कूप (सोने का कुआं) का जल ही उपयोग में लाया जाता है। मान्यता है कि श्रीमंदिर के संस्थापक राजा इंद्रद्युम्न ने स्वयं इस कुएं का निर्माण कराया था। लोकविश्वास है कि इसकी भीतरी दीवारों में सोने की ईंटें लगाई गई थी, जिससे जल की पवित्रता और दिव्यता बनी रहे।
वर्षभर इस कुएं को करीब दो टन वजनी लोहे के ढक्कन से ढककर रखा जाता है। देवस्नान पूर्णिमा के अवसर पर ही इसे खोला जाता है। ढक्कन हटाने के लिए 15 से 17 सेवकों की सामूहिक शक्ति लगती है। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच 108 कलशों में जल भरकर स्नान मंडप तक लाया जाता है।
108 कलशों से स्नान के बाद 'बीमार' हो जाते हैं भगवान
सनातन परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में शीतल जल से 108 कलशों द्वारा स्नान कराने के कारण भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद वे 15 दिनों के लिए अनासार गृह में विश्राम करते हैं। इस दौरान श्रीविग्रहों के दर्शन पूरी तरह बंद रहते हैं।
इसी अवधि में मंदिर में घंटियां नहीं बजतीं और कोई शुभ या नया निर्माण कार्य भी नहीं किया जाता। पूरे वातावरण को शांत और सात्विक बनाए रखा जाता है।
आयुर्वेदिक उपचार के बाद रथयात्रा के लिए तैयार होते हैं महाप्रभु
अनासार काल के दौरान महाप्रभु का उपचार राजवैद्य की देखरेख में किया जाता है। उन्हें विशेष आयुर्वेदिक औषधियां और जड़ी-बूटियों से तैयार 'पाचन' सहित पारंपरिक उपचार दिए जाते हैं। यह परंपरा भगवान के मानवीय स्वरूप और भक्तों के साथ उनके आत्मीय संबंध का प्रतीक मानी जाती है।
15 दिनों के उपचार के बाद 'नवयौवन दर्शन' में भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं और इसके अगले चरण में विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा में तीनों रथों पर आरूढ़ होकर श्रीगुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं।
शास्त्रों के अनुसार होता है जलाभिषेक का क्रम
वरिष्ठ सेवायतों के अनुसार देवस्नान का क्रम शास्त्रों में निर्धारित है। सबसे पहले सुदर्शन का स्नान होता है। इसके बाद क्रमशः बलभद्र, देवी सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ का अभिषेक किया जाता है।
108 कलशों का वितरण भी निश्चित परंपरा के अनुसार होता है।
- भगवान जगन्नाथ - 35 कलश
- भगवान बलभद्र -33 कलश
- देवी सुभद्रा -22 कलश
- सुदर्शन -18 कलश
लाखों श्रद्धालुओं के लिए अभेद सुरक्षा व्यवस्था
देवस्नान पूर्णिमा पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। भीड़ प्रबंधन के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहता है और शहरभर में सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी की जाती है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से इस दिव्य अनुष्ठान के साक्षी बन सकें।
देवस्नान पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ संस्कृति की उस अनूठी परंपरा का प्रतीक है, जिसमें भगवान को भी मनुष्य की तरह स्नान, बीमारी, उपचार और स्वास्थ्य लाभ की प्रक्रिया से जोड़ा गया है।
यही मानवीय भाव जगन्नाथ संस्कृति को विश्व की अन्य धार्मिक परंपराओं से अलग पहचान देता है। देवस्नान से शुरू होकर अनासार, नवयौवन दर्शन और अंततः रथयात्रा तक का पूरा क्रम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
