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नमक-मिर्च और प्याज खाकर सपनों को दी उड़ान, 1 ही परिवार के 5 भाई-बहन बनेंगे डॉक्टर

Published: Tue, 15 Sep 2026 04:46 PM (IST)

कंधमाल के दारिंगबाड़ी ब्लॉक के एक गरीब आदिवासी परिवार के पांच भाई-बहन डॉक्टर बनने की राह पर हैं। अभावों के ...और पढ़ें

परिवार के साथ पांचों बच्चे। जागरण

परिवार के साथ पांचों बच्चे। जागरण

HighLights

  1. कंधमाल के गरीब आदिवासी परिवार के पांच सदस्य डॉक्टर बनेंगे।

  2. पिता ने केरल में मजदूरी कर बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया।

  3. नीट परीक्षा पास कर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त किया।

शेषनाथ राय, भुवनेश्वर। कंधमाल जिले के दारिंगबाड़ी ब्लॉक के सिकबाड़ी गांव की एक गरीब आदिवासी परिवार की संघर्षगाथा आज पूरे जिले में प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

जर्जर कच्चा घर, आर्थिक तंगी, पहनने के लिए अच्छे कपड़ों का अभाव और दो वक्त की रोटी की चिंता के बीच इस परिवार ने शिक्षा को हथियार बनाया और अब एक ही परिवार के पांच भाई-बहन डॉक्टर बनने की राह पर हैं।

सिकबाड़ी गांव के बुर्सी प्रधान और उनकी पत्नी अनुसूया प्रधान के सात बच्चे हैं। गरीबी इतनी थी कि घर की मरम्मत तक नहीं हो पा रही थी।

बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता में बुर्सी प्रधान गांव छोड़कर मजदूरी करने के लिए केरल चले गए। वहां जो भी कमाई हुई, उसे बच्चों की पढ़ाई पर खर्च किया। वर्षों की मेहनत और त्याग का परिणाम अब सामने है।

सबसे पहले विभीषण ने क्रैक की NEET परीक्षा

चार वर्ष पहले बड़े बेटे विभीषण प्रधान ने सबसे पहले नीट परीक्षा में सफलता हासिल कर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था। वर्तमान में वह कोरापुट स्थित शहीद लक्ष्मण मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर इंटर्नशिप कर रहे हैं।

उनकी छोटी बहन मोनालिसा प्रधान ने पिछले वर्ष नीट उत्तीर्ण किया और अब कोरापुट मेडिकल कॉलेज में दूसरे वर्ष की छात्रा हैं।

इसी वर्ष परिवार के दो अन्य भाई-बहन सुनेमी प्रधान और एसरीय प्रधान ने भी नीट परीक्षा पास कर मेडिकल शिक्षा में प्रवेश प्राप्त किया है।

वहीं, बुर्सी प्रधान के छोटे भाई जिसाय प्रधान की बेटी मीनाक्षी प्रधान ने भी इस वर्ष नीट में सफलता हासिल कर मेडिकल पाठ्यक्रम के लिए योग्यता प्राप्त की है। इस तरह एक ही परिवार के पांच सदस्य डॉक्टर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

परिवार ने किया भारी संघर्ष

इन बच्चों का बचपन अभावों में बीता, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। डॉक्टर बनने का सपना देखा और उसे साकार करने के लिए कठिन परिश्रम किया। परिवार को भी इसके लिए भारी संघर्ष करना पड़ा। बच्चों की पढ़ाई के लिए बुर्सी प्रधान वर्षों तक केरल में दिहाड़ी मजदूरी करते रहे।

अब उनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वे पहले की तरह काम नहीं कर पाते, लेकिन बच्चों की पढ़ाई पूरी होने तक चिंता उनका पीछा नहीं छोड़ रही।

मक्का और हल्दी की खेती से होती है परिवार की आय

मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलने के बावजूद परिवार के बच्चे घर लौटने पर माता-पिता का हाथ बंटाते हैं। वे पशु चराने जाते हैं और समय मिलने पर पढ़ाई भी करते हैं। परिवार की आय का मुख्य स्रोत मक्का और हल्दी की खेती है, जिससे होने वाली मामूली आमदनी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो जाती है।

घर की हालत आज भी बेहद साधारण है। माता-पिता अक्सर पखाल भात (पानी में भिगोया हुआ चावल), नमक, मिर्च और प्याज खाकर गुजारा करते हैं, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देते।

पांच बच्चों के डॉक्टर बनने की संभावना से परिवार बेहद खुश है, लेकिन आगे की पढ़ाई और खर्च की चिंता भी उन्हें सता रही है। बच्चों का नामांकन कराने के लिए परिवार को बैल और बकरियां तक बेचनी पड़ीं।

बुर्सी प्रधान और उनकी पत्नी का कहना है कि यदि सरकार की ओर से कुछ आर्थिक सहायता मिल जाए तो बच्चों की पढ़ाई पूरी करने में बड़ी मदद मिलेगी।

दारिंगबाड़ी जैसे पिछड़े क्षेत्र के एक गरीब परिवार के पांच सदस्यों का मेडिकल शिक्षा में प्रवेश हासिल करना आज पूरे कंधमाल जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और यह कहानी संघर्ष, त्याग तथा शिक्षा की शक्ति का जीवंत उदाहरण बन गई है।