भुवनेश्वर, जेएनएन। चक्रवात फणि ने लगभग एक माह पहले तबाही मचायी थी, बावजूद इसके आज तक भी पूरी तरह से स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है। प्रभावितों के पास सरकार की तरफ से जारी की गई राहत सामग्री तो पहुंच गई है, मगर पुर्ननिर्माण कार्य, बिजली आर्पूित सेवा एवं पुनर्वास कार्य अभी तक नहीं हुआ। इतना ही नहीं तूफान से कितना नुकसान हुए, उसका भी आकलन नहीं हुआ। ऐसे में एक महीने बाद भी दयनीय अवस्था में लोग जीने को मजबूर हैं।

राज्य सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि पुनर्वास कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है, मगर केवल कागजों में दिखाई दे रहा है। अभी तक यदि नुकसान का ही पूरी तरह से आकलन नहीं हो सका है तो फिर पुनर्वास कार्य कितना हुआ है, इसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है।

शहरों की स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ है, ग्रामीण इलाके के लोग आज भी दुर्दशा भोगने को मजबूर हैं। कई जगहों पर लोगों के छप्पर उजड़े पड़े हैं, तो कुछ जगहों पर लोग प्लास्टिक की जरी डालकर गुजारा करने को मजबूर हैं। नुकसान का आकलन सही ढंग से न होने के कारण लोग खुद भी अपने घरों की मरम्मत नहीं कर रहे हैं। इसके पीछे उनके मन में डर छिपी हुई है। लोगों का मानना है कि यदि वे घरों की मरम्मत कर दें तो क्या पता उन्हें सरकारी सहायता राशि से वंचित रहना पड़ जाए। कई घर ऐसे हैं जो ठीक करने की स्थिति में ही नहीं हैं। सरकार से सहायता मिलने के बाद ही वह अपने घरों को ठीक करेंगे। 

बिजली सेवा भी पूरी तरह से दुरुस्त नहीं हो पायी है। खुद सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई यूटिलिटी ऑफ ओडिशा (सेसु) ने पुरी में 95 फीसद घरों में बिजली सेवा बहाल करने की बात कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि आधा ग्रामीण क्षेत्र आज भी अंधेरे में रहने को मजबूर है। तूफान के समय 39 लोगों की मौत हुई थी, जिनके परिवार को आजतक सहायता राशि नहीं मिल पायी है। प्रशासन की तरफ से प्राथमिक सहायता के तौर पर 50 किलो चावल व हजार रुपये बांटे गए हैं। वहीं विशेष राहत आयुक्त की तरफ से मृतक के परिजनों को चार लाख रुपये देने की जो घोषणा हुई थी, वह सहायता लोगों के पास अभी तक नहीं पहुंच पाई है।

तूफान में 400 वर्ग किमी. जंगल उजड़ गया है। इस जंगल पर 25 हजार लोगों की जीविका निर्भर थी। इनके लिए किस प्रकार से जीविका का इंतजाम किया जाएगा, इसकी योजना भी तैयार नहीं की गई है। मछुआरों की  स्थिति तो और संगीन है। उन्हें सरकारी सहायता देने की घोषणा की गई थी, लेकिन ना ही सहायता राशि मिली और ना ही जाल मिला। ऐसे में वे जीविका उपार्जन नहीं कर पा रहे हैं। इस तूफान ने सबसे ज्यादा नुकसान काजू जंगल को पहुंचाया है। अब लगभग 15 साल तक काजू नहीं मिलेगा। ऐसे में काजू पर निर्भर रहने वाले किसानों की कमर टूट गई है। कुल मिलाकर तूफान के एक महीने के समय गुजर जाने के बावजूद लोगों की मुसीबत कम नहीं हुई है। 

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Posted By: Babita kashyap

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