जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर : सामाजिक असमानता, पुष्टिहीनता एवं शिक्षादान व्यवस्था में गुणवत्ता की कमी से विकास का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है। प्राकृतिक संपदा से संपन्न तथा संस्कृति एवं परंपरा से समृद्ध ओडिशा की आज भी पिछड़े राज्य में गिनती होती है। राज्य में प्रति 10 शिशु में से 4 शिशु पुष्टिहीनता या आयु के हिसाब से मानसिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार हैं। यह निश्चित रूप से एक सतर्क चेतावनी होने की बात भारत सरकार के नीति आयोग के उपाध्यक्ष डा. राजीव कुमार ने कही है। वह स्थानीय रेलवे ऑडिटोरियम में शुक्रवार को आयोजित ओडिशा विकास सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विकास एवं सामाजिक क्षेत्र में अधिक कोष का विनियोग कर दक्ष तथा कुशल मानव संसाधन तैयार करने एवं श्रम आधारित उद्योग का विकास भारत के लिए एकमात्र विकल्प है।

इस अवसर पर केंद्रीय पेट्रोलियम व कौशल विकास मंत्री धर्मेद्र प्रधान ने कहा कि सामाजिक अनुसंधान, नीति निर्धारक, सरकारी अधिकारी, सामूहिक संगठन, विश्वविद्यालय आदि समाज के प्रत्येक वर्ग के प्रतिनिधि के लिए विशेष अवसर प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में बीएड कॉलेज या शिक्षक प्रशिक्षण को लेकर कॉलेज नहीं खुल रहा है। ऐसे में बीएड करने वाले हमारे राज्य के बच्चों खर्च कर्नाटक या फिर अन्य राज्यों में हो रहा है। ओडिशा के एक तिहाई लोग अपना घर छोड़कर अन्य राज्यों को जा रहे हैं। यदि ओडिशा में औद्योगिकीकरण बढ़ रहा है तो फिर राज्य में ओड़िआ लोगों को काम क्यों नहीं मिल रहा। प्रधान ने कहा कि उसी तरह राज्य में 40 प्रतिशत आदिवासी समाज के लिए रोडमैप तैयार करना होगा। 2022 में देश की आजादी का 75 साल पूरा हो रहा है एवं 2036 में ओडिशा को भाषा आधारित राज्य बने 100 साल पूरे हो जाएंगे। ऐसे में 2022 से 2036 तक ओडिशा के लिए संभावना एवं आह्वान का समय है।

इस अवसर पर उपस्थित अन्य अतिथियों में यूनेस्को के अध्यक्ष डा. राजेश टंडन, पद्मश्री तुलसी मुंडा आदि ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्र की वास्तविक स्थिति पर लिखी गई एक पुस्तिका अतिथियों ने विमोचन किया। तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में 19 समस्याओं पर चर्चा होगी। इस सम्मेलन में राज्य एवं राज्य बाहर के लगभग एक हजार प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।

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