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300 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत ढही, व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति से जुड़ी थीं यादें; बाल-बाल बची महिला

Published: Mon, 28 Sep 2026 09:56 PM (IST)

बालेश्वर के दामोदरपुर में 300 साल पुरानी एक ऐतिहासिक इमारत का बड़ा हिस्सा भारी बारिश के कारण ढह गया। यह इमारत ओडिया साहित्यकार फकीर मोहन सेनापति से जुड़ी थी।

कुछ दिनों से हो रही लगातार भारी बारिश के कारण इस जर्जर इमारत की दीवारें और नींव बेहद कमजोर हो गई थीं।

कुछ दिनों से हो रही लगातार भारी बारिश के कारण इस जर्जर इमारत की दीवारें और नींव बेहद कमजोर हो गई थीं।

HighLights

  1. भारी बारिश के कारण जर्जर हुई इमारत, कोई हताहत नहीं।

  2. ओडिया साहित्यकार फकीर मोहन सेनापति से जुड़ी थी यह धरोहर।

जासं, बालेश्वर। ओडिशा के बालेश्वर शहर के दामोदरपुर इलाके में रविवार शाम करीब 300 साल पुरानी एक ऐतिहासिक दो मंजिली इमारत का बड़ा हिस्सा अचानक ढह गया। 
 
क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से हो रही लगातार भारी बारिश के कारण इस जर्जर इमारत की दीवारें और नींव बेहद कमजोर हो गई थीं। हादसे के दौरान इमारत का भारी-भरकम मलबा सीधे मुख्य सड़क पर आ गिरा। 
 
जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। हालांकि, गनीमत रही कि इस दुर्घटना में कोई हताहत नहीं हुआ। यह इमारत ओडिया साहित्य के महान साहित्यकार और 'व्यासकवि' फकीर मोहन सेनापति की अनमोल स्मृतियों से जुड़ी मानी जाती है। 
 
स्थानीय लोगों और इतिहासकारों के अनुसार, फकीर मोहन सेनापति अपने शुरुआती जीवन में इसी भवन में रहकर पढ़ाई-लिखाई किया करते थे। इसी कारण इस ऐतिहासिक इमारत का ओडिया भाषा और साहित्य प्रेमी समुदाय के लिए गहरा और विशेष महत्व रहा है।
 
रिपोर्टों के अनुसार, इस भवन में बचु केशव राव का परिवार कई पीढ़ियों से निवास कर रहा है। घटना के वक्त परिवार के सदस्य मकान के दूसरे सुरक्षित हिस्से में मौजूद थे, जबकि जर्जर पड़ा हिस्सा अचानक ढह गया। 
 
इसके अलावा, हादसे के वक्त पास से गुजर रही एक महिला भी मलबे की चपेट में आने से बाल-बाल बच गई। यह पूरी खौफनाक घटना पास में लगे सीसीटीवी कैमरे में भी कैद हुई है।
 
इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों और साहित्य प्रेमियों ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। लोगों का कहना है कि लंबे समय से उचित रखरखाव न होने और हालिया बारिश ने भवन की स्थिति को अत्यंत दयनीय बना दिया था। 
 
घटना के बाद अब बालेश्वर में इस तरह की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासतों को तुरंत संरक्षित और पुनर्जीवित करने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है।