यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 20, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
भारत में चीनी उत्पादों के बहिष्कार का नहीं होगा राजनीतिक प्रभाव
चीन के एक सरकारी अखबार में दावा किया गया है कि भारत में हो रहे चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का बहुत ज्यादा राजनीतिक प्रभाव नहीं होगा।

बीजिंग, प्रेट्र। जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता में अड़ंगा डालने के कारण भारत में हो रहे चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का बहुत ज्यादा राजनीतिक प्रभाव नहीं होगा। इसकी वजह से दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में भी कोई मूलभूत बदलाव नहीं होगा।
चीन के सरकारी अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' में भारतीय मीडिया के हवाले से छपे एक लेख में यह दावा किया गया है। इसे चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ एशिया-पेसीफिक स्टडीज के एसोसिएट रिसर्च फैलो लियू शीऑक्स ने लिखा है। इसके मुताबिक, जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मेक इन इंडिया' नारे को बुलंद करना शुरू किया है। भारतीय मीडिया और नागरिकों के एक वर्ग ने हिंदू त्योहारों पर नजर आने वाले चीन में बने गुब्बारों, रंगीन लालटेनों और रिबन को यह कहते हुए मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है कि 'क्या हमें अपनी कीमती विदेशी मुद्रा इन उत्पादों पर बेकार करनी चाहिए? या भारतीय निर्माण उद्योग इतना पिछड़ा हुआ है कि वह इन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता?'
लेख के मुताबिक, उचित मूल्य पर आकर्षक वस्तु हमेशा ही उपभोक्ता का पहला विकल्प होता है। लेकिन, भारतीय मीडिया बार-बार जिन व्यापारिक वस्तुओं का जिक्र कर रहा है, वह भारत में चीनी निर्यात का बहुत छोटा सा ही हिस्सा है। हाईटेक उत्पादों का बड़ा निर्यातक होने की वजह से चीन भारत को मुख्य रूप से हाईटेक उत्पादों का ही निर्यात करता है। इनमें विद्युत और संचार उपकरण, रेल इंजन, कंप्यूटर और टेलीफोन शामिल हैं। यह सभी चीजें भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और उसके लोगों के दैनिक जीवन के लिए बेहद जरूरी हैं।
लेख में सवाल किया गया है कि क्या भारतीय लोग बहिष्कार के आह्वान का जवाब देंगे? यह अभियान कितने समय चल सकता है? इसका चीन-भारत व्यापार संबंधों पर क्या खास प्रभाव पड़ेगा? यहां तक कि इन प्रतिबंधों का समर्थन कर रहे भारतीय मीडिया के पास भी इसका जवाब नहीं है। माना जाता है कि राष्ट्रवाद की इस लहर के बाद भारत के उद्योगपति और उपभोक्ता कोई तर्कसंगत फैसला ही लेंगे।
