हिरोशिमा(एएफपी)। दुनिया के पहले परमाणु हमले में जीवित बचे लोगों के जहन में आज भी वो जख्म ताजा है जिस दिन अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर वो खतरनाक परमाणु हमला किया था। बेशक आज इनकी संख्या वक्त के साथ कम होती जा रही है लेकिन सात दशकों से ज्यादा वक्त के बाद भी उस घटना की भयावह यादें आज भी ताजा है।

उस घटना को याद करते हुए आज भी लोग सिहर उठते हैं। एमीको ओकाडा(79) परमाणु हमले की जगह से करीब 3 किलोमीटर दूर थी। उसके बावजूद वो हमले में जख्मी हो गई। जबकि उनकी बहन की मौत हो गई। उस हमले के दिन को याद कर वो कहती हैं "आसमान पर अचानक एक रोशनी दिखी और मैं जमीन पर गिर गई। मुझे नहीं पता धरती पर क्या चल रहा था। हर तरफ आग ही आग थी। लोगों में इंसानों जैसा कुछ बचा नहीं था। उनकी त्वचा ढीली पड़ रही थी। कुछ बच्चों की आंखों की पुतलियां बाहर आ गई थीं।"

"मुझे आज भी डूबते सूर्य की चमक को देखने से नफरत है। ये मुझे उस दिन की याद दिलाता है जो मुझे काफी दर्द देता है। उस हमले का दुष्परिणाम ये हुआ कि कई बच्चे जो हमले में बचाए गए वो सभी अनाथ हो गए। देशभर से कई बदमाश हिरोशिमा आए और उन्हें खाना और बंदूकें दी।"

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इस हमले की दूसरी चश्मदीद कीको ओगुरा(78) अपनी पूरी जिंदगी उस भयानक दिन को याद करते हुए गुजार रही है। वो बताती हैं "बम धमाके के अचानक बाद काले रंग की चिपचिपी बारिश शुरू हो गई। इस बारिश ने मेरे पूरे कपड़ों को भिगो दिया। वहां एक लाइन में जले हुए लोग पड़े थे। अचानक मेरे पैरों पर एक लड़की आकर गिरी और उसने पानी मांगा। इसके बाद वहां दूसरे लोग भी पानी मांगने लगे। मैं उन लोगों के लिए पानी लेकर आई लेकिन इसे पीते ही कुछ लोग मर गए। मुझे उनको पानी देने पर काफी पछतावा हुआ। हमनें उस दहशत का सामना किया था। मैं सबकों बताना चाहती हूं कि ये सब भयावह था। यहां हिरोशिमा में कोई शांति नहीं है। यहा सिर्फ डर है।"

पार्क नैम जो(83) कोरियाई है। वो उस दिन रेडिएशन के प्रभाव में आने के कारण ब्रेस्ट कैंसर और स्कीन कैंसर से पीड़ित हैं। हिरोशिमा में परमाणु हमले में करीब 20 हजार कोरियाई लोगों की मौत हो गई थी।

बता दें हिरोशिमा में छह अगस्त 1945 को पहला परमाणु बम गिराया गया था। इस हमले में लगभग 1.4 लाख लोग मारे गए थे। कई सालों तक विकिरण से यहां मौतें होती रही थी। इसके तीन दिन बाद जापान के दक्षिणी शहर नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। इस हमले में 74 हजार लोग मारे गए थे। इसे दूसरे विश्वयुद्ध के निर्णायक कदमों में से एक माना जाता है।

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Edited By: Manish Negi