हवाना, रायटर/जेएनएन। पड़ोस में रहकर करीब 50 साल तक अमेरिका की आंखों की किरकिरी बने रहे फीदेल कास्त्रो (90) ने शुक्रवार को हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं। उनके निधन से क्यूबा में 9 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है।

वह दुनिया में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में ही शुमार नहीं थे बल्कि साम्यवादी व्यवस्था के स्तंभ थे, जो सोवियत संघ टूटने के बाद भी नहीं दरका। कास्त्रो भारत के अभिन्न मित्र थे।

Photos: 5 दशकों तक अमेरिका भी थर्राता रहा इस तानाशाह से

पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से शुरू हुआ दोस्ती का यह सिलसिला इंदिरा गांधी तक प्रगाढ़ रूप में कायम रहा। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिवंगत नेता के निधन पर शोक जताया है। साम्राज्यवादी व्यवस्था के विरोधी कास्त्रो ने क्यूबा में शोषण के खिलाफ लड़कर 1959 में साम्यवादी सत्ता स्थापित की थी। ताजिंदगी हरे रंग की मिलिट्री पोशाक पहनने वाले कास्त्रो ने अमेरिका की दहलीज पर रहते हुए भी अपने देश में पूंजीवादी व्यवस्था को घुसने नहीं दिया।

शायद इसी का नतीजा रहा कि क्यूबा को आज भी दुनिया की सबसे खुशहाल जनता वाले देशों में गिना जाता है। क्रांति के दिनों में फीदेल का नारा दुनिया में बहुत प्रचलित हुआ। वह कहते थे- रुको नहीं, आगे बढ़ते रहो- जब तक विजय न मिल जाए। सन 2006 से कास्त्रो की तबीयत खराब चल रही थी। दो साल बाद उन्होंने सत्ता अपने छोटे भाई राउल कास्त्रो को सौंप दी लेकिन पर्दे के पीछे असली ताकत वही बने रहे।

क्यूबा के समयानुसार शुक्रवार रात साढ़े दस बजे राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने सरकारी टेलीविजन से घोषणा की कि क्यूबा की क्रांति के सर्वोच्च कमांडर फीदेल अब नहीं हैं। फीदेल की मौत की घोषणा के बाद लोग शोक में डूब गए, हवाना की सड़कें सूनसान हो गईं। लेकिन अमेरिका के मियामी में क्यूबा से भागकर शरण पाए लोग सड़कों पर आ गए और उन्होंने नाचते और अपने बर्तन बजाते हुए खुशी का इजहार किया। कहा जाता है कि अमेरिका विरोधी रुख के चलते वहां की खुफिया संस्था सीआइए ने फीदेल को मारने का कई बार प्रयास किया लेकिन वह हमेशा असफल रही।

Edited By: Digpal Singh