जोहानिसबर्ग। इस दौर के महानतम नेता, नोबेल पुरस्कार विजेता, गांधीवादी, भारत रत्न और अहिंसात्मक संघर्ष के जरिये रंगभेद से मुक्ति दिलाने के बाद दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का निधन गुरुवार [भारतीय समयानुसार गुरुवार आधी रात के बाद] को हो गया। दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति मंडेला लंबे समय से बीमारियों से जूझ रहे थे।

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95 वर्षीय मंडेला ने अंतिम सांस अपने घर में ली। उनके निधन पर भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, इजरायल, मैक्सिको, जर्मनी और स्वीडन सहित कई देशों ने शोक व्यक्त किया। राजनीतिक हस्तियों के साथ ही खेल व मनोरंजन की दुनिया से जुड़े लोगों ने भी मंडेला की मृत्यु पर दुख जताया। शुक्रवार को उनका पार्थिव शरीर सैन्य अस्पताल ले जाया गया। शांतिनायक का अंतिम संस्कार 15 दिसंबर को पूर्वी केप प्रांत के कुनू में किया जाएगा।

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने गुरुवार रात मंडेला के निधन की घोषणा की। टेलीविजन पर राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने बताया कि हमारे प्रिय और लोकतांत्रिक देश के पहले संस्थापक राष्ट्रपति नेल्सन रोलिहलहला डालीभुंगा मंडेला अब हमारे बीच नहीं रहे। हमारे देश ने एक महान बेटे को खो दिया। हमारी जनता के सिर से पिता का साया उठ गया। मंडेला को राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी जाएगी और राष्ट्रीय ध्वज झुका रहेगा। स्वतंत्रता के लिए उनके अथक संषर्घ और इंसानियत ने उन्हें महान बनाया।

अपने लोकप्रिय नेता के निधन से पूरा देश आहत हो उठा है। देश भर से लोग उनके अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि देने के लिए ह्यूटन स्थित उनके घर पहुंच रहे हैं। दुनिया भर में जहां उनके निधन पर शोक जताया जा रहा है, वहीं उनके चाहने वालों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें सम्मान देने के लिए उनकी गौरव गाथाओं के गीतों पर नाच-गा रहे हैं। ऐसे लोग मंडेला की पार्टी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) के हरी, पीली और काली पट्टी वाले झंडे ओढ़कर उनके संघर्ष के गीत गा रहे थे।

अल्पसंख्यक श्वेत शासन से दक्षिण अफ्रीका को मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन की अगुआई करने वाले मंडेला ने अपनी उम्र का एक चौथाई से ज्यादा समय कारागार में काटा। 27 साल तक जेल में बंद रहे पेशे से वकील और पूर्व बॉक्सर मंडेला ने ज्यादातर समय राबेन द्वीप स्थित जेल में बिताया था। दुनिया बेशक उन्हें संत की संज्ञा देती रही, लेकिन खुद उनके शब्दों में वह कोई संत नहीं थे। उन्होंने कहा था कि उन्हें संत के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है और जेल में बिताए दिनों के दौरान इसी बात ने उन्हें सबसे ज्यादा परेशान किया। 1994 में हुए दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक चुनाव में वह पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए।

1993 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि भारत ने 1990 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा। मंडेला का जन्म 1918 में केप ऑफ साउथ अफ्रीका के पूर्वी हिस्से के एक छोटे से गांव म्वेजो के थेंबू समुदाय में हुआ था। उन्हें उनके कबीले वाले मदीबा नाम से पुकारते थे।

मंडेला फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित थे और वह करीब तीन महीने तक प्रिटोरिया अस्पताल में भर्ती रहे। इसके बाद सितंबर, 2013 से घर पर ही डॉक्टरों की टीम उनकी देखभाल कर रही थी। मंडेला महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत से प्रेरित थे। इसी वजह से उन्हें दूसरा गांधी भी कहा जाता है। उन्होंने हिंसा पर आधारित रंगभेदी शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए अहिंसा को अपना हथियार बनाया। उनके निधन पर दक्षिण अफ्रीका में 10 दिन के शोक की घोषणा की गई है, जबकि भारत और अमेरिका ने अपने राष्ट्रध्वज को मंडेला के सम्मान में आधा झुकाने का एलान किया है। दक्षिण अफ्रीका में 8 दिसंबर को पूरे दिन प्रार्थना सभा होगी।

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