- बिहपुर में शहद उत्पादन यूनिट के अलावा गारमेट्स क्लस्टर भी बनाया गया था

- अब क्लस्टर में हाथ-मशीनों की जगह आईं डिजिटल और इलेक्ट्रिक मशीनें मिथिलेश कुमार, बिहपुर : दो वर्ष पहले देश में कोरोनावायरस के आने से जब लाकडाउन लगा तो परदेस से कामगारों को गांव लौटना पड़ा। इन कामगारों को अपने गांव में ही रोजगार मिले इसके लिए सरकारी या सहकारी स्तर पर रोजगार के साधन दिए गए। बिहपुर में शहद उत्पाद और रेडीमेड गारमेंट बनाने का क्लस्टर खोला गया। यह क्लस्टर अब समृद्ध हो रहा है। यहां काम करने वाले लोगों में 20 ने अब तक काम नहीं छोड़ा। ये सब मजदूर से कुशल मजदूर बन गए हैं। इनकी रोज की कमाई 500 रुपये पहुंच गई है।

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प्रखंड कार्यालय प्रांगण स्थित भवन में दो वर्ष पूर्व अप्रवासी मजदूर जो परपंरागत सिलाई मशीन चलाते थे, वे अब डिजिटल इलेक्ट्रिक मशीन चलाने लगे हैं। इस क्लस्टर के अध्यक्ष मु. मोसीन व सचिव मु. माबूद अंसारी बताते हैं कि कोरोनाकाल के दौरान इस क्लस्टर में 100 मजदूर थे। उन लोगों ने ढाई लाख से अधिक मास्क बनाए थे। यहां के मास्क की इतनी डिमांड हुई कि सब हाथों हाथ बिक गए। वर्तमान में इस कलस्टर में 20 अप्रवासी रोजाना करीब पांच सौ रुपये कमा रहे हैं। इनकी कारीगरी में और निखार लाने में ट्रेनर सह मुख्य कारीगर साजिद अंसारी का मुख्य योगदान है।

यहां के ट्रेनर और संचालक मजदूरों को न केवल डिजिटल मशीन चलाने के गुर सिखाए बल्कि हल्के प्रयास से कपड़ों में और खूबसूरती लाने के तरीके भी बता रहे हैं। यहां कोट, पैंट, बनियान, शेरवानी, शर्ट, कुर्ता व पायजामा समेत महिलाओं के लिए डिजाइनर ब्लाउज, सलवार, कुर्ती व प्लाजो आदि भी बनते हैं। क्लस्टर संचालक बताते हैं कि यहां सिले जाने वाले कपड़े देश के कई महानगरों की फैक्ट्रियों में बनने वाले प्रोडक्ट को टक्कर दे रहे हैं। यहां से कपड़े खरीदने के लिए मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, बेगूसराय समेत झारखंड के भी कई जिलों के कपड़ा व्यवसायी आते हैं।

------ क्लस्टर में काम कर रहे साकिब अंसारी, लेडीज ड्रेस मास्टर जावेद अंसारी, मोतीउर्रहमान, साजिद अंसारी, सहूबी खातून आदि अप्रवासियों ने कहा कि हम अब डिजिटल मशीन भी चलाना सीख गए हैं। पहले केवल मजदूर थे लेकिन अब मास्टर कहे जाते हैं। दिल्ली, मुंबई के मुकाबले यहां ज्यादा सहूलियत है। वहां हजार, दो हजार रुपये भले ही ज्यादा मिलते थे लेकिन यहां सुकून ज्यादा है। बड़े वाले शहरों में कमरे का किराया, खरीदा हुआ अनाज खाते थे। बहुत बचत कर लेते थे तो आठ हजार रुपये घर भेज पाते थे। त्योहार भी परिवार के साथ नहीं होते थे। अब हमारा पूरा मेहनताना बच रहा है। परिवार के साथ भी रह रहे हैं।

Edited By: Jagran