- क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई के प्रस्ताव को मिली अनुमति

झाँसी : इतिहास और संस्कृति को अपने आँचल में समेटे बुन्देलखण्ड में धरोहर बिखरी पड़ी हैं। उन्हें सहेजकर संरक्षित करने की पुरातत्व विभाग की कवायद रंग ला रही है। उप्र राज्य पुरातत्व परामर्शदात्री समिति ने झाँसी एवं चित्रकूट मण्डल के 20 स्मारकों को राजकीय संरक्षण में लिये जाने की अनुमति दे दी है।

क्षेत्रीय पुरातत्व निदेशक डॉ. एसके दुबे ने बताया कि दोनों मण्डलों के गाँव-गाँव में खोज करने के बाद 20 स्मारक ऐसे पाये गये जो 100 साल से भी अधिक पुराने हैं। इनके संरक्षण के लिये शासन ने अधिसूचना जारी कर दी है। अधिसूचना जारी होने के साथ ही जनसामान्य से आपत्ति माँगी गयी है कि यदि किसी को इनके राजकीय संरक्षण में लिये जाने पर आपत्ति है तो वह अवगत कराएं। आपत्ति का निस्तारण होने के बाद अन्तिम रूप से चयनित स्मारकों को राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में ले लिया जायेगा।

यह स्मारक किये गये चयनित

0 रामजानकी मन्दिर : झाँसी के चिरगाँव स्थित रामपुरा गाँव में बना यह मन्दिर उत्तर मध्यकाल का बताया जाता है। मन्दिर का निर्माण एक ़जमींदार ने आगरा के कारीगरों से कराया था। मन्दिर में हनुमान द्वारा अहिरावण वध व कृष्ण लीला के चित्र उकेरे गये हैं।

0 डिमरौनी की गढि़या : झाँसी के बड़ागाँव स्थित डिमरौनी में बनी गढि़या भी उत्तर मध्यकालीन बतायी जाती हैं। इन्हें किले का छोटा रूप कहा जाता है।

0 दौन का प्राचीन मन्दिर : झाँसी के बड़ागाँव में दौन गाँव में स्थित मन्दिर में काफी प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। यह मन्दिर पूर्व मध्यकाल का माना जाता है।

0 खैलार की बावली : झाँसी के बबीना स्थित खैलार की बावली (बावड़ी) उत्तर मध्यकालीन है। यह बावली स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। स्नानागार में जाने के लिये सीढि़याँ बनी हुयी हैं और छतों पर गोल गुम्बद इसकी खासियत हैं।

0 चन्देली मन्दिर : झाँसी के चिरगाँव के पचार गाँव में स्थित चन्देली मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसे मध्यकाल का माना जाता है।

0 केदारेश्वर मन्दिर : झाँसी के मऊरानीपुर स्थित रौनी गाँव में बना केदारेश्वर मन्दिर पूर्व मध्य काल का है, जिसमें नन्दी पर शिवलिंग विराजमान हैं।

0 शिव मन्दिर : मऊरानीपुर के सिजारी खुर्द में स्थित शिवजी का यह मन्दिर पूर्व मध्यकालीन है। मन्दिर की स्थापना के बारे में आज तक स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं।

0 विष्णु प्रतिमा : मऊरानीपुर के चकारा में पायी गयी विष्णु प्रतिमा पूर्व मध्यकालीन मानी जाती है। यह प्रतिमा अभी भी अखण्डित है।

0 गुसाइयों का किला : झाँसी के मोठ में स्थित गुसाइयों का किला उत्तर मध्यकालीन माना जाता है। कहा जाता है कि जब बुन्देलखण्ड में गुसाई शासन था तब गुसाई राजा यहाँ रहा करते थे।

0 राम-जानकी मन्दिर : झाँसी के बामौर स्थित सुट्टा गाँव में राम-जानकी का एक अति प्राचीन मन्दिर है, जिसे मध्यकालीन बताया जा रहा है।

0 दुर्ग का परकोटा : ललितपुर जनपद के जखौरा स्थित देवगढ़ में प्राचीन दुर्ग का परकोटा अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। यह मध्यकालीन बताया जाता है। इस किले के अन्दर 31 जैन मन्दिर हैं। यहाँ प्रतिहर और चन्देल शासकों ने राज्य किया।

0 मडावरा का किला : ललितपुर के मड़ावरा में स्थित मध्यकालीन किला मराठा शासक मोराजी द्वारा बनवाया गया था, जिस पर बाद में राजा मर्दन सिंह के साढू भाई बख्तवली सिंह ने कब्जा कर लिया था।

0 सिरसी की गढ़ी : ललितपुर जनपद के जखौरा स्थित सिरसी गाँव में एक मध्यकालीन गढ़ी है, जिसे छोटे किले के नाम से भी जाना जाता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह गढ़ी स्वतन्त्रता सेनानियों का प्रमुख केन्द्र रही है।

0 बानपुर का किला : ललितपुर के महरौनी में बानपुर का किला है, जो मध्यकालीन बताया जाता है। यहाँ राजा मर्दन सिंह का शासन था, जो झाँसी की रानी महारानी लक्ष्मीबाई के मुँहबोले भाई और विश्वासपात्र राजाओं में गिने जाते थे।

0 चित्रित भोलाश्रय : ललितपुर जनपद के मड़ावरा स्थित नवागढ़ गाँव में पाषाणकालीन चित्रित भोलाश्रय पाये गये थे। पुरातत्व विभाग इन्हें अपने संरक्षण में लेकर पर्यटन विकास करायेगा।

0 चन्देलकालीन मन्दिर : हमीरपुर जनपद के राठ कस्बा स्थित नादगाँव में चन्देलकालीन मन्दिर स्थित हैं। मध्य काल में बनाये गये यह मन्दिर अपनी कलाकृति के अद्भुत नमूने माने जाते हैं। अधिकांश मन्दिर शिवजी को समर्पित हैं।

0 ब्रिटिश सेमिट्रि : हमीरपुर नगर में ब्रिटिश कालीन सेमिट्रि है। यहाँ वर्ष 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुयी बगावत के दौरान 2 अंग्रे़ज अफसर को गोलियों से भून दिया गया था।

0 सेनापति महल : महोबा जनपद के कुलपहाड़ में उत्तर मध्यकालीन सेनापति महल महाराजा छत्रसाल के वंशज सेनापति का निवास माना जाता है। बताया जाता है कि सौतेली माँ ने जहर खिलाकर सेनापति की हत्या कर दी थी।

0 बीरबल की रंगशाला : जालौन जनपद के महेबा स्थित कालपी में बीरबल की रंगशाला स्थित है। इस मध्यकालीन रंगशाला में अकबर के नौरत्‍‌नों में शुमार बीरबल का निवास था। इसके निर्माण में अनगढ़ पत्थरों व लाखौरी ईटों का प्रयोग हुआ है।

0 नदीगाँव का किला : जालौन जनपद के नदीगाँव में बना किला मध्यकालीन माना जाता है। यह किला दतिया के राजा ने बनवाया था, जो आज भी दतिया रियासत का हिस्सा माना जाता है। यहाँ वर्तमान में जिला परिषद द्वारा विद्यालय संचालित किया जा रहा है।

फाइल : मुकेश त्रिपाठी

:

अभी यह स्मारक हैं संरक्षित

राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में इस समय झाँसी का लक्ष्मी मन्दिर, रघुनाथराव महल हाथी खाना, बरुआसागर का किला, ललितपुर के जखौरा का राम मन्दिर, उल्दनकलाँ का शिव मन्दिर, सौजना का जैन मन्दिर, भदौरा का दिगम्बर जैन मन्दिर, बार का नवगृह मन्दिर, सीरोन खुर्द का मन्दिर, पिपरई का लक्ष्मण गण मन्दिर, मादौन का सुमेरगढ़ मन्दिर, भौंता का मन्दिर, धौजरी का रणछोर मन्दिर, लागौन का मन्दिर तथा कुण्ड, बालाबेहट का किला, हटवारा मन्दिर, सतगता की प्रस्तर बावड़ी, गिरवर का राम मन्दिर, ककरुआ का मन्दिर, सीरोन का मन्दिर, सौरई का किला, गोंडवानी मन्दिर, गुगरवारा का शिव मन्दिर, टोड़ी का मन्दिर, बार का मकबरा, पिपरई के 2 गोंडवानी मन्दिर, बिजरौठा की बैठक, धनगोल का दुर्गा मन्दिर, बरीखुर्द का राघवेन्द्र सरकार मन्दिर, महोबा के भदरवारा का शान्तिनाथ मन्दिर, चरखारी का ड्योढ़ी दरवाजा, इमिलिया डाँग का मन्दिर, बम्होरी बेलदारन का योगिनि माता मन्दिर, सूपा की गढ़ी है।

:

स्मारकों के संरक्षण के मानक

किसी भी स्मारक को संरक्षित करने के लिये पुरातत्व विभाग ने मानक तय किये हैं। इसके अनुसार स्मारक कम से कम 100 वर्ष पुराना, दुर्लभ, स्थापत्य कला, ऐतिहासिकता व पुरातत्विक महत्व का होना चाहिये। संरक्षण प्रस्ताव के पहले उच्चस्तरीय समिति सर्वे करती है। फिर आपत्तियाँ माँगी जाती हैं। जिन स्मारकों के लिये आपत्तियाँ नहीं आतीं, उन्हें संरक्षित सूची में शामिल कर लिया जाता है।

----------------

फाइल : मुकेश त्रिपाठी

Edited By: Jagran