मोतिहारी। अक्षय नवमी का पवित्र व्रत सोमवार को मनाया जाएगा। यह व्रत कार्तिक शुक्लपक्ष नवमी को किया जाता है। इस व्रत को करने से समस्त पूजन, अनुष्ठान, तर्पण आदि का फल अक्षय हो जाता है। इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर आंवले के वृक्ष के नीचे पूजन कर जड़ में दूध की धारा गिराकर, पेड़ के चारों ओर सूत लपेट कर आरती करके एक सौ आठ परिक्रमाएं करने का विधान है। इस दिन वस्त्र, आभूषण आदि का दान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन कुष्मांड (भथुआ) के अंदर स्वर्ण या द्रव्य आदि रखकर गुप्त दान करने की भी परंपरा है। आज के दिन आंवले की छाया में ब्राह्मण भोजन करवाने के पश्चात अपने बंधु-बांधवों के साथ भोजन करना चाहिए। इस दिन आंवले का दान भी करना चाहिए। उक्त बातें महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पांडेय ने कही हैं। उन्होंने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार पूर्वकाल में जब सारा जगत जल में निमग्न हो गया था समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो गए थे। उस समय परमात्मा ब्रह्मा जी परब्रह्म का जप करने लगे थे। ब्रह्म का जप करते-करते उनके आगे श्वास निकला तथा भगवत दर्शन के अनुरागवश उनके नेत्रों से जल निकल आया। प्रेम के आंसुओं से परिपूर्ण वह जल की बूंद पृथ्वी पर गिर पड़ी। उसी से आंवले का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ। सब वृक्षों में सबसे पहले आंवला ही उत्पन्न हुआ इसलिए उसे आदिरोह कहा गया। ब्रह्मा ने पहले आंवले को उत्पन्न किया, उसके बाद समस्त प्रजा व सृष्टि की। जब देवता आदि की सृष्टि हो गई तब वे उस स्थान पर आए जहां आंवले का वृक्ष था। उसी समय आकाशवाणी हुई- यह आंवले का वृक्ष सब वृक्षों में श्रेष्ठ है, क्योंकि यह भगवान विष्णु को प्रिय है। प्राचार्य पांडेय ने बताया कि इसके स्मरण मात्र से ही मनुष्य गोदान का फल प्राप्त करता है। इसके दर्शन से दोगुना और फल खाने से तीनगुना पुण्य होता है। इसलिए सर्वथा प्रयत्न करके आंवले के वृक्ष का सेवन करना चाहिए। क्योंकि यह भगवान विष्णु को परम प्रिय एवं सब पापों का नाश करने वाला है। इसलिए समस्त कामनाओं की सिद्धि के लिए आंवले के वृक्ष का पूजन करना पुण्य फलदायक होता है।

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