जागरण संवाददाता, बिहारशरीफ : मकर संक्रांति के मौके पर कोरोना काल के दस माह बाद आज हिरण्य पर्वत पर फिर से रौनक दिखी। सुबह में चूड़ा-दही का लुत्फ लेने के बाद लोग दोपहर में हिरण्य पर्वत पर सैर को निकल गए। देखते-देखते लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। बड़े, युवा, महिलाएं काफी दिनों के बाद हिरण्य पर्वत पर सैर का आनंद उठाया। हालांकि यहां पर पहुंचे लोग जान जोखिम में डालकर बाउंड्री के बाहर इंजॉय करते दिखे। यही नहीं लोग पहाड़ के लास्ट पॉइंट पर जाकर सेल्फी ले रहे थे। बता दें कि हिरण्य पर्वत पर सुरक्षा के ²ष्टिकोण से जिला प्रशासन द्वारा लोहे की जाली लगाकर बाउंड्री कर दी गई है। लोगों को हिदायत दी गई है कि इस बाउंड्री के बाहर लोग न जाए मगर लोग जिला प्रशासन के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए लास्ट पॉइंट पर बैठकर तस्वीरें खिचवाते दिखे। सबसे बड़ी बात यह है की लोग अपना तो जान जोखिम में डाल ही रहे हैं। साथ ही अपने परिवार की भी लोगों को कोई ़िफक्र नहीं है। इस स्थल पर पुलिस की तैनाती होनी चाहिए थी मगर पुलिस वहां नहीं दिखी। ऐसे में कोई बड़ा हादसा से इनकार नहीं किया जा सकता है। बता दें इस पॉइंट से गिरकर कई लोगों की मौत हो चुकी है।

कृषि संस्कृति पर्व का रूप है लोहड़ी उत्सव पेज चार फोटो 01 - नव नालंदा महाविहार में पहली बार मना लोहड़ी संवाद सूत्र, नालन्दा: नव नालंदा महाविहार (सम विश्वविद्यालय, नालंदा) में पहली बार लोहड़ी मनाई गई । लोहड़ी कृषि समाजों का एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो प्रमुखत: पंजाब, जम्मू, हिमाचल, हरियाणा आदि प्रदेशों तथा भारत के अन्य हिस्सों में मनाया जाता है। लोहड़ी की संध्या को लोग लकड़ी जलाकर अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हुए प्रसन्नता से नाचते-गाते हैं तथा आग में रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। अग्नि की परिक्रमा करते व आग के चारों ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। इस दौरान रेवड़ी, खील, गजक, मक्का खाने का आनंद लेते हैं। ऐसा ही नव नालंदा महाविहार परिसर में आज सायंकाल लोहड़ी- उत्सव आयोजित हुआ। इस अवसर पर महाविहार के कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने इस आयोजन को महाविहार में भारत की विविध संस्कृतियों के संकुल के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि महाविहार में इस कृषि- संस्कृति के पर्व के मनाए जाने से भारतीय सांस्कृतिक एकता को और भी बल मिलेगा। उन्होंने लोहड़ी को खुशी का प्रतीक बताया । इसमें सभी मिलजुल कर प्रसन्नता बांटते हैं। उन्होंने सभी को इस पर्व की बधाई देते हुए सबकी प्रगति की कामना की। इस अवसर पर प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव '' परिचय दास'''' , (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग) ने इस पर्व को रेवड़ी व गजक के मीठेपन,आग के ताप की तेजस्विता, संस्कृति के कृषि- आधारों , प्रसन्नता के प्रकटीकरण तथा सम्बंधों की तरलता का प्रतिरूप माना। डॉ. सुरेश कुमार,( सहायक प्रो़फेसर , बौद्ध अध्ययन) ने डोगरी में लोहड़ी की लोककथा लयबद्ध ढंग से सुनाई। जिससे यह पर्व स्मृति में सजीव हो उठा। लोक समाजों के विश्वासों, प्रतीतियों, आस्थाओं तथा रंगों को उन्होंने लोहड़ी के माध्यम से गहरे ढंग से उकेरा । इस आयोजन के सूत्रधार की भूमिका भी उन्होंने निभाई। डॉ. सोनम लामो ने लद्दाखी गीत गाकर एक विशिष्ट वातावरण सृजित कर दिया।

इस लोहड़ी पर्व में प्रमुख रूप से मैडम कुलपति डॉ. नीहारिका लाभ, प्रो रवींद्र नाथ श्रीवास्तव '' परिचय दास'', प्रो विजय कर्ण, प्रो सुशीम दुबे, डॉ श्रीकांत सिंह, डॉ. विश्वजीत कुमार, डॉ. हरे कृष्ण तिवारी, डॉ. दीपंकर लामा, डॉ. मुकेश वर्मा, डॉ. प्रदीप दास, डॉ. सुरेश कुमार, डॉ. सोनम लामो, डॉ. अनुराग शर्मा, डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी, डॉ बुद्धदेव भट्टाचार्य आदि महाविहार के आचार्यों के साथ डॉ. सुनील प्रसाद सिन्हा, रजिस्ट्रार , गैर शैक्षणिक सदस्य, शोधार्थी एवं छात्र- छात्राएं उपस्थित हुए ।

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