अमन मिश्रा, रांची :

छठ बीतते ही रविवार को राजधानी के अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान में काफी गिरावट आई। शाम की सर्द हवाएं लोगों को बढ़ती ठंड का एहसास करा रही है। ऐसे में सोचने वाली बात है कि वे कैसे रहते होंगे जिनके सिर पर छत नहीं है। जो सड़कों पर सिर्फ पतले कंबल के सहारे रात बिताने को मजबूर हैं उन्हें नींद भला कैसे आती होगी। रविवार की रात दैनिक जागरण ने शहर के रैन बसेरों की पड़ताल की। कई रैन बसेरों में ताला लटका मिला, तो कहीं कमरे ही खाली नहीं मिले। मेन रोड में तो ट्रैफिक पोस्ट को ही रहने का ठिकाना बना कर कुछ लोग रात बिताते दिखे। तो अलबर्ट एक्का चौक पर कई दुकानों के बंद शटर के बाहर लोग अखबार बिछाकर प्लास्टिक ओढ़े सोये हुए मिले। आगरा का रहने वाला करीब 35 वर्षीय युवक प्रदीप शर्मा पढ़ा लिखा है। किसी मामले को लेकर बीते 18 नवंबर को हाई कोर्ट में सुनवाई थी। छठ पर्व के कारण कोर्ट बंद हो गया। जिसके बाद वह जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम के सामने स्थित रैन बसेरा में पहुंचा। वहां उसने देखा ताला लटका है। जिसके बाद से प्रदीप चार दिनों से ठेले पर कंबल ओढ़ कर सोने को विवश हैं। बातचीत में बताया कि कमरा नहीं होने के कारण दिन में इधर-उधर घूमते हैं और फिर रात होने के बाद ठेला खाली होने का इंतजार करना पड़ता है। रिम्स के रैन बसेरा में एक सप्ताह से नहीं मिल रहा है कोई कमरा

इधर, राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स परिसर में भी दो रैन बसेरा है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि किसी में भी कमरा खाली नहीं है। नतीजन आम जनों के साथ मरीज तक को किसी तरह बरामदे में ही रात गुजारनी पड़ रही है। बिहार के गया जिला से आए एक परिवार ने बताया कि बेटे को न्यूरो की समस्या है, एक सप्ताह से कमरे की आस लगाए बैठे हैं। इतने दिनों में एक भी कमरा खाली नहीं हुआ।

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