धीरेंद्र वर्मा

मैंने 1954 में लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। मेरे विषय थे अंग्रेजी साहित्य, राजनीति शास्त्र और हिदी साहित्य। अंग्रेजी साहित्य मैंने इसलिए चुना था क्योंकि मेरी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के प्रतिष्ठित स्कूल डॉन बोस्को में हुई थी और मेरा अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था। राजनीति शास्त्र इसलिए कि मुझे देश की राजनीति और सामाजिक परिपेक्ष्य में रुचि थी और हिदी साहित्य चुनने का कारण था मेरे पिता श्री भगवती चरण वर्मा की विरासत का निर्वहन करना। एमए में प्रवेश लेते समय जब इन तीनों विषय में से एक को चुनने का प्रश्न आया तो मैं बीए में अर्जित अपने अंक और अभिरुचि के अनुसार अंग्रेजी साहित्य पढ़ना चाहता था, लेकिन उस समय तक मैं लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ का महामंत्री चुन लिया गया था। अंग्रेजी विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. एवी राव मुझसे बोले, ''देखो धीरेंद्र, तुम्हें यदि अंग्रेजी साहित्य को गंभीरता से पढ़ना है तो तुम्हे क्लास में नियमित रूप से उपस्थित रहना पड़ेगा।'' छात्रसंघ की जिम्मेदारियों के साथ नियमित उपस्थिति थोड़ी कठिन थी।

इसके बाद मैंने हिदी साहित्य पढ़ने की सोची तो वहां के विभागाध्यक्ष डॉ. दीनदयाल गुप्ता ने मुझे उलाहना देते हुए कहा, ''अगर अंग्रेजी साहित्य नहीं संभाल पाओगे तो क्या हिदी साहित्य पढ़ लोगे।'' यानी अब मेरे पास केवल राजनीति शास्त्र का विकल्प बचा और कमाल की बात ये कि राजनीति शास्त्र के अध्यक्ष डॉ. बीएम शर्मा ने मेरा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया।

लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में मैंने लंबा समय गुजारा। बीए में प्रवेश लेते ही मैं यूनियन काउंसिल का सदस्य हो गया और दूसरे वर्ष में कला प्रतिनिधि और एमए प्रथम वर्ष में मैं छात्रसंघ का महामंत्री चुन लिया गया। ये चुनाव सबसे चुनौतीपूर्ण और कठिन था क्योंकि मेरे प्रतिद्वंदी थे सीएमएस स्कूल के संस्थापक जगदीश गांधी और विनय चंद्र मिश्रा जो कि बाद में बार काउंसिल के अध्यक्ष भी चुने गए। इतने सशक्त प्रतिद्वंदियों के बावजूद मैं ये चुनाव भारी मतों से जीता।

छात्रसंघ के महामंत्री के रूप में मैंने राजनीति के साथ-साथ छात्रों को कला और साहित्य से जोड़ने का प्रयास किया। छात्रसंघ कार्यालय में युवा साहित्यकारों का जमघट लगा रहता था। उन्हीं दिनों मैंने अखबार में पढ़ा कि प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू लखनऊ के प्राणि उद्यान में आयोजित एक कार्यक्रम के लिए आ रहे हैं। विचार आया और मैं अपनी साइकिल से अमौसी एयरपोर्ट पहुंच गया। पंडित जी जैसे ही बाहर आए भीड़ को चीरता हुआ मैं उनके सामने जा खड़ा हुआ-

''मेरा नाम धीरेंद्र है, मैं लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ का महामंत्री हूं, मैं चाहता हूं कि आप थोड़ी देर के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करने के लिए परिसर में चलें।''

पंडित जी ने जवाब दिया, ''मैं अवश्य चलता, लेकिन मेरा प्राणि उद्यान जाने का कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित है, सो मेरे पास समय नहीं है।''

''आप जानवरों के बच्चों से मिलना चाहते हैं अच्छी बात है, लेकिन इंसानों के बच्चों के लिए भी थोड़ा समय निकाल लीजिए।'' मैंने छात्र नेता की ठसक के साथ कहा। पंडित नेहरू मुस्कुराए और बोले, ''ठीक 12 बजे मैं वहां पहुंच जाऊंगा, तुम सारी व्यवस्थाएं कर लो।''

मैंने एयरपोर्ट से ही तत्कालीन वाइस चांसलर राधा कमल मुखर्जी जी को फोन से सूचित किया कि दो घंटे में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू परिसर पहुंच रहे हैं और वे छात्रों को सम्बोधित करेंगे। वाइस चांसलर महोदय को तो एकदम शॉक लग गया। खैर, उन्होंने तुरंत अपने स्टाफ को काम पर लगा दिया और इस तरह से लखनऊ विश्वविद्यालय में पहली बार किसी भी प्रधानमंत्री का आगमन हुआ। - लेखक प्रख्यात साहित्यकार भगवती चरण वर्मा के पुत्र, वरिष्ठ साहित्यकार और राजनीतिक विचारक हैं।

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