लखनऊ [जाब्यू]। सोचता हूं कि सोचने से कुछ नहीं होता, फिर सोचता हूं कि बिना सोचे कुछ नहीं होता।

जागरण फोरम में समकालीन चिंतन: उत्कृष्टता की खोज विषय पर आयोजित सत्र में इन पंक्तियों से बात शुरू करते हुए महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली के कुलपति प्रो मुहम्मद मुजम्मिल ने कहा कि हर दिन नई चुनौती लाता है और इनसे निपटना ही हमारी लिए चुनौती है। समय के साथ विकास के आयाम और परिभाषा बदलती है। जरूरत है विकास को साझेदार बनाने की।

मुल्क की आजादी के बाद बीते छह दशकों में देश के विकास की बदलती प्राथमिकताओं का खाका खींचते हुए उन्होंने कहा कि विकास को साझेदार बनाने के लिए तीन स्तरों क्षेत्रीय/राज्य, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहल की जा सकती है। 11वीं पंचवर्षीय योजना ने जहां समेकित विकास पर बल दिया, वहीं 12वीं योजना में अधिक समेकित व टिकाऊ आर्थिक विकास पर जोर दिया गया है। यही हमारे कल का ख्वाब है। इस ख्वाब को हासिल करने के लिए उप्र से भुखमरी और गरीबी को मिटाना होगा। प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा के बाद अगले दशक में सभी को उच्च शिक्षा मुहैया कराना समय की मांग होगी।

उच्च शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार करने के साथ उनकी गुणवत्ता बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना चाहिए। सरकार की कोशिश होनी चाहिए कि सभी को समानता के साथ शिक्षा हासिल करने का हक हासिल हो। महिलाओं के साथ जारी आर्थिक-सामाजिक भेदभाव को भी मिटाना होगा। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति सुधारने के अलावा खेती व विकास की अन्य योजनाओं में पर्यावरण संगत नीतियां अपनानी होंगी।

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