लखनऊ [जागरण ब्यूरो]। पिछड़े राज्यों में शुमार बिहार की कृषि विकास दर को अपने प्रयासों से बीते वित्तीय वर्ष में 17.6 प्रतिशत और मात्यिसिकी विकास दर में 19 फीसदी की जबर्दस्त उछाल लाने वाले डॉ. मंगला राय के मुताबिक यह करिश्मा उत्तर प्रदेश में भी दोहराया जा सकता है। जरूरत है सही नीतियों को अपनाने और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिये उन्हें अमली जामा पहनाने की।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक व बिहार के मुख्यमंत्री के कृषि सलाहकार डॉ.राय ने जागरण फोरम में 'समकालीन चिंतन : उत्कृष्टता की खोज' विषय पर आयोजित सत्र में कहा कि बिहार व उत्तर प्रदेश, खासतौर पर पूर्वांचल की परिस्थितियां एक जैसी हैं। उप्र में भी मात्सियिकी और कृषि विकास की असीम संभावनाएं हैं। साथ ही कृषि और दुग्ध उत्पादों का प्रसंस्करण और मूल्य वर्धन कर उप्र के गांवों में खुशहाली लायी जा सकती है। उप्र में मवेशियों की बड़ी संख्या है लेकिन हम उनका सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे। बकरी के दूध से बने पनीर और भैंस के दूध से बने मझरेला चीज की कीमत यूरोप के बाजारों में 50 डालर है। पोल्ट्री के क्षेत्र में मुर्गियों की विकसित प्रजातियों को अपनाकर अंडे का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। वहीं मात्सियिकी के विकास के लिए बंजर और अनुपजाऊ भूमि का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हमें भूमि व जल उपयोग की कारगर दीर्घकालिक संदर्श योजनाएं बनाने की जरूरत होगी वर्ना स्थिति भयावह होगी। देश में सिंचाई के पानी का 10 प्रतिशत बेहतर इस्तेमाल कर 50 मिलियन टन अतिरिक्त अनाज पैदा किया जा सकता है। मनरेगा सरीखी योजना का इस्तेमाल गांवों में स्थायी पूंजी निर्माण और मिट्टी का क्षरण रोकने के लिए किया जाना चाहिए।

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